Chaitra Navratri 2026: घोड़े पर सवार होकर आएंगी माँ दुर्गा, जानें कलश स्थापना का शुभ मुहूर्त, विधि और महत्व।
हिंदू धर्म में नवरात्रि का विशेष महत्व है। साल 2026 में चैत्र नवरात्रि की शुरुआत बहुत ही शुभ संयोगों के साथ हो रही है। इस बार मां दुर्गा का आगमन ‘घोड़े’ पर हो रहा है, जिसे ज्योतिष शास्त्र में बड़े बदलावों का संकेत माना जाता है। आज के इस लेख में हम आपको बताएंगे कि कलश स्थापना का सबसे सटीक मुहूर्त क्या है और इस नवरात्रि आपको किन बातों का खास ख्याल रखना चाहिए।
Chaitra Navratri 2026, Shubh Muhurat, Ghatasthapana Vidhi, Maa Durga Vahan 2026.कलश स्थापना (Ghatasthapana) का शुभ मुहूर्त:
चैत्र नवरात्रि प्रतिपदा तिथि से शुरू होती है। साल 2026 में कलश स्थापना के लिए सबसे उत्तम समय निम्नलिखित है:
- प्रातः काल मुहूर्त: सुबह 06:15 AM से 10:10 AM तक।
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अभिजीत मुहूर्त: दोपहर 11:50 AM से 12:40 PM तक (यह सबसे श्रेष्ठ मुहूर्त माना जाता है)।
माँ दुर्गा का वाहन ‘घोड़ा’ और इसका फल:
हर साल माँ दुर्गा अलग-अलग वाहनों पर सवार होकर आती हैं। इस बार माँ का वाहन घोड़ा (Ashwa) है। शास्त्रों के अनुसार, जब माँ घोड़े पर आती हैं, तो यह समाज और राजनीति में तेज़ी से होने वाले बदलावों और प्रगति का प्रतीक होता है। भक्तों के लिए यह समय साहस और शक्ति संचय करने का है।
पूजा की संक्षिप्त विधि (Puja Vidhi):
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पवित्रता: सुबह जल्दी उठकर स्नान करें और साफ कपड़े पहनें।
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कलश स्थापना: मिट्टी के पात्र में जौ (Jau) बोएं और उसके ऊपर जल से भरा कलश स्थापित करें।
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नारियल: कलश के मुख पर कलावा बांधें और आम के पत्ते रखकर उस पर चुनरी में लिपटा नारियल रखें।
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अखंड ज्योत: अगर संभव हो तो पूरे 9 दिनों के लिए अखंड ज्योत जलाएं।
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मंत्र जाप: ‘ॐ ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चे’ मंत्र का जाप करें।
नवरात्रि के 9 दिन और देवी के स्वरूप:
पहला दिन: माँ शैलपुत्री:
पर्वतराज हिमालय की पुत्री होने के कारण इन्हें ‘शैलपुत्री’ कहा जाता है। इनके दाहिने हाथ में त्रिशूल और बाएं हाथ में कमल का फूल है। इनका वाहन वृषभ (बैल) है।
महत्व: यह स्थिरता और दृढ़ संकल्प का प्रतीक हैं।
2. माँ ब्रह्मचारिणी (दूसरा दिन): ‘ब्रह्म’ का अर्थ है तपस्या। माँ का यह रूप बहुत ही शांत और सौम्य है। इनके दाएं हाथ में जप की माला और बाएं हाथ में कमंडल है।
महत्व: यह संयम, तप और विजय का आशीर्वाद देती हैं।
3. माँ चंद्रघंटा (तीसरा दिन): इनके मस्तक पर घंटे के आकार का अर्धचंद्र है, इसलिए इनका नाम ‘चंद्रघंटा’ पड़ा। इनके 10 हाथ हैं और यह शेर पर सवार हैं।
महत्व: यह वीरता और निडरता का प्रतीक हैं, इनकी पूजा से एकाग्रता बढ़ती है।
4. माँ कुष्मांडा (चौथा दिन): शास्त्रों के अनुसार, माँ ने अपनी मंद मुस्कान से ‘ब्रह्मांड’ की रचना की थी। इन्हें अष्टभुजा देवी भी कहा जाता है।
महत्व: यह सुख, समृद्धि और अच्छी सेहत का आशीर्वाद देती हैं।
5. माँ स्कंदमाता (पांचवां दिन): भगवान कार्तिकेय (स्कंद) की माता होने के कारण इन्हें ‘स्कंदमाता’ कहा जाता है। इनकी गोद में कार्तिकेय का बाल रूप बैठा रहता है।
महत्व: इनकी पूजा से मोक्ष का मार्ग प्रशस्त होता है और ज्ञान बढ़ता है।
6. माँ कात्यायनी (छठा दिन): महर्षि कात्यायन की तपस्या से प्रसन्न होकर माँ ने उनके घर पुत्री के रूप में जन्म लिया था। यह बहुत शक्तिशाली स्वरूप है।
महत्व: विवाह में आने वाली बाधाओं को दूर करने और शत्रुओं पर विजय के लिए इनकी पूजा की जाती है।
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7. माँ कालरात्रि (सातवां दिन): यह माँ का सबसे भयानक रूप है। इनका शरीर अंधेरे के समान काला है और बाल बिखरे हुए हैं। गले में बिजली जैसी चमकने वाली माला है।
महत्व: भले ही यह दिखने में डरावनी हैं, लेकिन यह भक्तों का हमेशा शुभ करती हैं, इसलिए इन्हें ‘शुभंकरी’ भी कहा जाता है।
8. माँ महागौरी (आठवां दिन – अष्टमी): कठोर तपस्या के कारण इनका शरीर काला पड़ गया था, लेकिन शिव जी के आशीर्वाद से यह फिर अत्यंत गोरी हो गईं। इनका वाहन सफेद बैल है।
महत्व: यह शांति और करुणा की देवी हैं। कुंवारी कन्याओं का पूजन इसी दिन विशेष रूप से किया जाता है।
9. माँ सिद्धिदात्री (नौवां दिन – नवमी): यह सभी प्रकार की सिद्धियों को देने वाली देवी हैं। भगवान शिव ने भी इन्हीं की कृपा से ‘अर्धनारीश्वर’ रूप पाया था।
महत्व: यह पूर्णता का प्रतीक हैं, इनकी पूजा से जीवन की सभी मनोकामनाएं पूरी होती हैं।
निष्कर्ष : चैत्र नवरात्रि आत्म-शुद्धि और शक्ति की उपासना का पर्व है। इस दौरान सच्चे मन से की गई पूजा व्यक्ति के जीवन के सभी संकटों को दूर करती है। Express Update की ओर से आप सभी पाठकों को चैत्र नवरात्रि की हार्दिक शुभकामनाएं!
(पोस्ट माँ कात्यानी छतरपुर मंदिर के सौजन्य से )
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