पंचांग से जुड़ी जानने योग्य बातें तिथि का जीवन में महत्व। वार, शुभ मुहूर्त और राहुकाल कैसे देखें ? तिथि से जुड़ी पौराणिक कथा।
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पंचांग क्या होता है
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तिथि कैसे तय होती है
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शुभ मुहूर्त क्यों जरूरी है
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राहुकाल का अर्थ
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पंचांग देखने के फायदे
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रोज़ पंचांग देखने की सही आदत
आज का पंचांग – पंचांग से जुड़ी जानने योग्य बातें तिथि का जीवन में महत्व।
हिंदू धर्म में पंचांग का विशेष महत्व होता है। किसी भी शुभ कार्य की शुरुआत से पहले पंचांग देखने की परंपरा सदियों से चली आ रही है। आज भी लोग विवाह, गृह प्रवेश, मुंडन, पूजा-पाठ या यात्रा से पहले पंचांग जरूर देखते हैं। लेकिन पंचांग केवल तिथि बताने तक सीमित नहीं है, बल्कि यह समय, ग्रहों और शुभ-अशुभ योगों की पूरी जानकारी देता है।
पंचांग क्या होता है?
पंचांग पाँच अंगों से मिलकर बनता है — तिथि, वार, नक्षत्र, योग और करण। इन्हीं पाँच तत्वों के आधार पर दिन की शुभता या अशुभता तय की जाती है। पंचांग का उद्देश्य व्यक्ति को सही समय पर सही निर्णय लेने में मदद करना होता है।
तिथि का महत्व।
तिथि चंद्रमा की स्थिति के अनुसार निर्धारित होती है। व्रत, त्योहार और धार्मिक अनुष्ठान तिथि के आधार पर ही किए जाते हैं। सही तिथि की जानकारी होने से पूजा-पाठ और व्रत का पूर्ण फल मिलता है।
वार क्यों जरूरी है?
हर दिन किसी न किसी ग्रह से जुड़ा होता है, जैसे सोमवार चंद्रमा से और मंगलवार मंगल ग्रह से। वार के अनुसार पूजा और कार्य करने से सकारात्मक परिणाम मिलने की मान्यता है।
शुभ मुहूर्त क्या होता है?
राहुकाल को अशुभ समय माना जाता है। इस दौरान नए कार्य शुरू करने से बचना चाहिए। हालांकि, पूजा-पाठ और नियमित कार्य राहुकाल में भी किए जा सकते हैं। राहुकाल की जानकारी होने से गलत समय पर महत्वपूर्ण निर्णय लेने से बचा जा सकता है। रोज दैनिक पंचांग देखें।
पंचांग देखने के फायदे।
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शुभ और अशुभ समय की सही जानकारी
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धार्मिक कार्यों में सफलता और मानसिक संतुलन
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एकादशी, अमावस्या, पूर्णिमा जैसी तिथियाँ विशेष पुण्यदायी मानी जाती हैं
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दान तिथि के अनुसार करने से विशेष फल की प्राप्ति होती है
तिथि व्यक्ति के मानसिक और आध्यात्मिक संतुलन से जुड़ी मानी जाती है
आत्मविश्वासजीवन में सकारात्मकता का संचार होता है।
पंचांग को रोज़ देखना क्यों जरूरी है?
पंचांग न सिर्फ धार्मिक दृष्टि से बल्कि जीवन प्रबंधन के लिए भी उपयोगी है। सही समय पर किया गया कार्य सफलता की संभावना बढ़ा देता है। यही कारण है कि आज भी पंचांग को जीवन का मार्गदर्शक माना जाता है।
तिथि से जुड़ी पौराणिक कथा और महत्व या तिथि की उत्पत्ति कैसे हुई।
पौराणिक मान्यताओं के अनुसार तिथि की उत्पत्ति चंद्रदेव से जुड़ी हुई है।
कथा के अनुसार, चंद्रदेव का विवाह दक्ष प्रजापति की बेटी 27 कन्याओं जो (नक्षत्रों) के नाम से जाने जाते हैं, उनसे हुआ था। लेकिन चंद्रदेव का विशेष प्रेम रोहिणी से था। इससे नाराज़ होकर दक्ष प्रजापति ने चंद्रदेव को क्षय रोग (घटते तेज) का श्राप दे दिया।
प्रजापति ने चंद्रदेव को क्षय रोग का श्राप दे डाला। चंद्रदेव को रोगो के प्रभाव के श्राप से चंद्रदेव धूमिल होने लगे। श्राप के प्रभाव से चंद्रदेव धीरे-धीरे क्षीण होने लगे। तब सभी देवताओं ने मिलकर भगवान शिव से प्रार्थना की। शिवजी ने चंद्रदेव को वरदान दिया कि वे पूरी तरह नष्ट नहीं होंगे, बल्कि कृष्ण पक्ष में घटेंगे और शुक्ल पक्ष में बढ़ेंगे।
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इसी बढ़ने-घटने की प्रक्रिया से:
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तिथि का निर्माण हुआ
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अमावस्या से पूर्णिमा और पूर्णिमा से अमावस्या का चक्र बना
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व्रत, पर्व और त्योहारों की तिथियाँ निश्चित हुईं
इसी कारण हिंदू धर्म में चंद्रमा आधारित पंचांग को विशेष महत्व दिया जाता है।
तिथि का धार्मिक महत्व।
निष्कर्ष
पंचांग हमें समय की कीमत समझाता है। यदि सही समय और सही दिशा में प्रयास किया जाए, तो जीवन में उन्नति और शांति दोनों प्राप्त की जा सकती हैं। इसलिए पंचांग को केवल परंपरा नहीं, बल्कि जीवन को बेहतर बनाने का माध्यम समझना चाहिए।
“तिथि की उत्पत्ति कैसे हुई?”
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