क्या बदल रही है भारत की विदेश नीति? इज़राइली संसद में पीएम के संबोधन पर कांग्रेस की आपत्ति क्यों,पीएम के इज़राइल संबोधन पर कांग्रेस का सवाल, 1947 का ऐतिहासिक संदर्भ क्यों आया चर्चा में? जानें पूरा विश्लेषण।
प्रस्तावना: प्रधानमंत्री के इज़राइली संसद में हालिया संबोधन के बाद भारत की विदेश नीति को लेकर नई राजनीतिक बहस शुरू हो गई है। विपक्षी दल कांग्रेस ने इस भाषण पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि इससे भारत की “नैतिक स्थिति” (moral standing) प्रभावित हो सकती है।
इस विवाद के दौरान 1947 के ऐतिहासिक संदर्भों और स्वतंत्र भारत की प्रारंभिक विदेश नीति का भी उल्लेख किया गया। ऐसे में यह सवाल उठता है कि क्या वास्तव में भारत की विदेश नीति में कोई बड़ा बदलाव हो रहा है, या यह बदलते वैश्विक परिदृश्य के अनुरूप एक रणनीतिक विस्तार है?
क्या है पूरा विवाद?
प्रधानमंत्री ने अपने संबोधन में भारत और इज़राइल के बीच बढ़ते रणनीतिक सहयोग, तकनीकी साझेदारी और सुरक्षा संबंधों को मजबूत बताया।
इसके बाद कांग्रेस ने बयान जारी कर कहा कि भारत की विदेश नीति ऐतिहासिक रूप से संतुलन और नैतिक दृष्टिकोण पर आधारित रही है। विपक्ष ने स्वतंत्र भारत के पहले प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू के 1947 के एक पत्र का संदर्भ देते हुए यह संकेत दिया कि उस दौर की सोच अलग थी।
भारत-इज़राइल संबंधों पर नई बहस: क्या बदला है कूटनीतिक रुख? जानें पूरा विश्लेषण
ऐतिहासिक पृष्ठभूमि: 1947 और विदेश नीति का प्रारंभिक दृष्टिकोण
भारत जब स्वतंत्र हुआ, उस समय विश्व राजनीति द्वितीय विश्व युद्ध के बाद नए स्वरूप में उभर रही थी।
उस दौर में भारत की प्राथमिकताएँ थीं। जैसे:
-
उपनिवेशवाद का विरोध
-
गुटनिरपेक्ष नीति अपनाना
-
अरब देशों और पश्चिमी देशों के बीच संतुलन
इज़राइल के गठन के प्रश्न पर भारत ने प्रारंभ में सावधानीपूर्ण रुख अपनाया। हालांकि, बाद में भारत ने इज़राइल को औपचारिक मान्यता दी और समय के साथ संबंध विकसित हुए।
क्या बदल रहा है भारत की विदेश नीति? इज़राइली संसद में पीएम के भाषण पर सियासी घमासान।
भारत-इज़राइल संबंध: कैसे बढ़े रिश्ते?
1992 में भारत और इज़राइल के बीच पूर्ण राजनयिक संबंध स्थापित हुए। उसके बाद:
-
रक्षा क्षेत्र में सहयोग बढ़ा
-
कृषि और सिंचाई तकनीक में साझेदारी हुई
-
स्टार्टअप और टेक्नोलॉजी सेक्टर में सहयोग मजबूत हुआ
- पिछले एक दशक में उच्च स्तरीय यात्राओं और समझौतों के कारण दोनों देशों के संबंध और गहरे हुए हैं।
भारत-इजराइल सम्बन्ध: विक्कीपीडिया वेबसाइट विजिट करें।
आप विजिट कर सकते है: For historical background on India’s diplomatic evolution:
कांग्रेस की मुख्य आपत्तियाँ
कांग्रेस का तर्क है कि:
-
भारत की विदेश नीति संतुलन पर आधारित रही है
-
पश्चिम एशिया के मुद्दों पर भारत का रुख ऐतिहासिक रूप से सावधान रहा है
-
अंतरराष्ट्रीय मंचों पर भारत की छवि एक संतुलित राष्ट्र की रही है
विपक्ष का कहना है कि किसी भी रणनीतिक कदम में ऐतिहासिक संतुलन का ध्यान रखना आवश्यक है।
क्या यह नीति बदलाव है या रणनीतिक विस्तार?
विशेषज्ञों का मानना है कि विदेश नीति समय और परिस्थितियों के अनुसार विकसित होती है।
आज भारत:
-
वैश्विक मंच पर एक उभरती शक्ति है
-
ऊर्जा सुरक्षा, व्यापार और तकनीक को प्राथमिकता देता है
-
बहुपक्षीय संबंधों की नीति अपनाता है
ऐसे में कुछ विश्लेषक इसे “नीति बदलाव” की बजाय “नीति विकास” (policy evolution) मानते हैं।
अंतरराष्ट्रीय परिप्रेक्ष्य
भारत के लिए पश्चिम एशिया क्षेत्र कई कारणों से महत्वपूर्ण है:
- व्यापारिक संबंध, सामरिक संतुलन
भारत ने हाल के वर्षों में इज़राइल के साथ संबंध मजबूत किए हैं, लेकिन साथ ही अरब देशों के साथ भी सक्रिय संवाद बनाए रखा है।
घरेलू राजनीति का प्रभाव
विदेश नीति के मुद्दे अक्सर घरेलू राजनीति में भी चर्चा का विषय बनते हैं।
जब कोई बड़ा अंतरराष्ट्रीय संबोधन या समझौता होता है, तो विपक्ष उसकी समीक्षा करता है। यह लोकतांत्रिक व्यवस्था का हिस्सा है।
सरकार इसे राष्ट्रीय हित में उठाया गया कदम बताती है, जबकि विपक्ष ऐतिहासिक और नैतिक दृष्टिकोण से प्रश्न उठाता है।
भारत की कूटनीतिक चुनौती
आधुनिक विदेश नीति अब केवल वैचारिक नहीं, बल्कि आर्थिक, तकनीकी और सुरक्षा हितों से भी जुड़ी हुई है। भारत के सामने सबसे बड़ी चुनौती यह है कि वह एक ओर अपनी रणनीतिक साझेदारियों को मजबूत बनाए रखे, दूसरी ओर पारंपरिक और ऐतिहासिक संबंधों को सुरक्षित रखे, साथ ही वैश्विक मंचों पर अपनी स्वतंत्र और संतुलित विदेश नीति को निरंतर जारी रख सके।
और भी पढ़ें: संसद में विपक्ष का बड़ा दांव, क्या सरकार पर पड़ेगा असर?
विशेषज्ञों की राय विदेश नीति विश्लेषकों के अनुसार:
प्रवासी भारतीयों की बड़ी संख्या, ऊर्जा आपूर्ति, भारत की नीति बहुस्तरीय है
राष्ट्रीय हित सर्वोपरि हैंसंतुलन बनाए रखना भारत की दीर्घकालिक रणनीति का हिस्सा है। एक भाषण से व्यापक नीति निष्कर्ष निकालना कठिन होता है, लेकिन राजनीतिक विमर्श में ऐसे मुद्दे प्रतीकात्मक महत्व ले लेते हैं।
निष्कर्ष
प्रधानमंत्री के इज़राइली संसद में दिए गए संबोधन और उस पर कांग्रेस की प्रतिक्रिया ने विदेश नीति पर नई चर्चा शुरू की है।
जहाँ एक पक्ष इसे ऐतिहासिक संतुलन से अलग मानता है, वहीं दूसरा पक्ष इसे बदलती वैश्विक परिस्थितियों के अनुरूप रणनीतिक कदम मानता है।
सच्चाई संभवतः इन दोनों दृष्टिकोणों के बीच है।
भारत की विदेश नीति समय के साथ विकसित होती रही है और आगे भी राष्ट्रीय हितों के आधार पर आकार लेती रहेगी।
-
कृपया अपनी प्रतिक्रिया साझा करें:
