अरावली पहाड़ियाँ क्यों जरूरी? NCR पर्यावरण पर इसका प्रभाव तथा पर्यावरणीय महत्व।
अरावली पहाड़ियाँ भारत की सबसे पुरानी पर्वत श्रृंखलाओं में से एक हैं, जो दिल्ली-NCR के पर्यावरण संतुलन में अहम भूमिका निभाती हैं। हाल के वर्षों में अरावली क्षेत्र में बढ़ती गतिविधियों और निर्माण कार्यों के कारण इनके संरक्षण को लेकर चिंता बढ़ी है। इस लेख में हम समझेंगे कि अरावली पहाड़ियाँ क्यों जरूरी हैं और इनका असर दिल्ली-NCR के पर्यावरण पर कैसे पड़ता है।
अरावली पहाड़ियों का पर्यावरणीय महत्व (पानी, हवा, जैव विविधता)
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अरावली भारत की सबसे पुरानी पर्वत श्रृंखला है
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ये धूल भरी हवाओं को रोकती हैं
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बारिश का पानी जमीन में रोकने में मदद करती हैं
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अरावली पहाड़ियाँ क्यों जरूरी? NCR पर्यावरण पर इसका प्रभाव
रावली पहाड़ियाँ भारत की सबसे प्राचीन पर्वत श्रृंखलाओं में से एक हैं और उत्तर भारत के पर्यावरण संतुलन में इनकी भूमिका बेहद अहम मानी जाती है। यह पर्वत श्रृंखला राजस्थान से होते हुए हरियाणा और दिल्ली-NCR तक फैली हुई है। अरावली केवल पहाड़ नहीं हैं, बल्कि यह पूरे क्षेत्र के लिए एक प्राकृतिक सुरक्षा कवच की तरह काम करती हैं।
अरावली पहाड़ियाँ पश्चिमी राजस्थान से आने वाली गर्म और धूल भरी हवाओं को रोकने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं। यदि अरावली नहीं होतीं, तो थार मरुस्थल का प्रभाव दिल्ली-NCR तक बहुत तेजी से फैल सकता था। इन पहाड़ियों की वजह से रेगिस्तानीकरण की प्रक्रिया धीमी रहती है और भूमि की उर्वरता बनी रहती है।
पर्यावरण के लिहाज़ से अरावली का एक बड़ा योगदान भूजल संरक्षण में है। पहाड़ियों की चट्टानी संरचना वर्षा जल को धीरे-धीरे जमीन के भीतर जाने में मदद करती है, जिससे आसपास के क्षेत्रों में भूजल स्तर संतुलित रहता है। यही कारण है कि अरावली क्षेत्र कई नदियों, झीलों और जलस्रोतों के लिए प्राकृतिक recharge zone का काम करता है।
अरावली पहाड़ियाँ जैव विविधता का भी एक महत्वपूर्ण केंद्र हैं। यहाँ कई प्रकार के पेड़-पौधे, औषधीय वनस्पतियाँ, पक्षी और वन्य जीव पाए जाते हैं। यह जैव विविधता न केवल पर्यावरण संतुलन बनाए रखने में मदद करती है, बल्कि स्थानीय जलवायु को भी स्थिर रखने में सहायक होती है।
इसके अलावा, अरावली पहाड़ियाँ वायु प्रदूषण को नियंत्रित करने में भी योगदान देती हैं। पहाड़ियों पर मौजूद हरित क्षेत्र कार्बन डाइऑक्साइड जैसी हानिकारक गैसों को अवशोषित करता है और वातावरण में ऑक्सीजन की मात्रा बढ़ाता है। यही वजह है कि अरावली को दिल्ली-NCR के “ग्रीन लंग्स” के रूप में भी देखा जाता है।
कुल मिलाकर, अरावली पहाड़ियाँ उत्तर भारत के पर्यावरण के लिए एक आधार स्तंभ की तरह हैं। इनका संरक्षण केवल प्राकृतिक धरोहर को बचाने का सवाल नहीं है, बल्कि यह आने वाली पीढ़ियों के लिए स्वच्छ हवा, पानी और संतुलित जलवायु सुनिश्चित करने से भी जुड़ा हुआ है।
दिल्ली-NCR के लिए अरावली क्यों जरूरी हैं
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प्रदूषण कम करने में भूमिका
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भूजल recharge
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गर्मी और desertification रोकने में मदद
प्रदूषण कम करने में अरावली की भूमिका
अरावली पहाड़ियाँ दिल्ली-NCR क्षेत्र में बढ़ते वायु प्रदूषण को नियंत्रित करने में एक प्राकृतिक अवरोध की तरह काम करती हैं। अरावली क्षेत्र में मौजूद जंगल, पेड़-पौधे और हरित आवरण हवा में मौजूद धूलकण, पीएम2.5 और पीएम10 जैसे प्रदूषक तत्वों को अवशोषित करने में मदद करते हैं। इससे हवा की गुणवत्ता बेहतर बनी रहती है।
इसके अलावा, अरावली पहाड़ियाँ राजस्थान की ओर से आने वाली धूल भरी और गर्म हवाओं को दिल्ली-NCR तक पहुंचने से काफी हद तक रोकती हैं। अगर अरावली का प्राकृतिक आवरण कमजोर होता है, तो प्रदूषण का स्तर और अधिक खतरनाक हो सकता है। यही कारण है कि अरावली को दिल्ली-NCR की “प्राकृतिक एयर फिल्टर” भी कहा जाता है।
भूजल रिचार्ज में अरावली का योगदान
अरावली पहाड़ियों की भौगोलिक संरचना ऐसी है कि यह वर्षा जल को धीरे-धीरे जमीन के भीतर समाहित होने में सहायता करती है। जब बारिश होती है, तो पहाड़ियों पर गिरा पानी तेजी से बहने के बजाय मिट्टी और चट्टानों के बीच से रिसकर नीचे चला जाता है, जिससे भूजल स्तर रिचार्ज होता है।
दिल्ली-NCR और आसपास के क्षेत्रों में पानी की बढ़ती कमी के बीच अरावली का यह गुण अत्यंत महत्वपूर्ण हो जाता है। कई छोटे-बड़े जलस्रोत, झीलें और कुएं अरावली क्षेत्र पर ही निर्भर हैं। यदि अरावली क्षेत्र में निर्माण कार्य और खनन बढ़ता है, तो इसका सीधा असर भूजल स्तर पर पड़ता है और जल संकट और गंभीर हो सकता है।
गर्मी और रेगिस्तानीकरण (Desertification) रोकने में मदद
अरावली पहाड़ियाँ उत्तर भारत में तापमान संतुलन बनाए रखने में भी अहम भूमिका निभाती हैं। पहाड़ियों पर मौजूद वनस्पति वातावरण में नमी बनाए रखने में मदद करती है, जिससे अत्यधिक गर्मी और हीटवेव की तीव्रता कम होती है। यही कारण है कि अरावली क्षेत्र के आसपास का तापमान अपेक्षाकृत संतुलित रहता है।
इसके साथ ही, अरावली पहाड़ियाँ थार मरुस्थल के विस्तार को रोकने में भी सहायक हैं। यह पर्वत श्रृंखला रेगिस्तान से आने वाली गर्म हवाओं और रेत को आगे बढ़ने से रोकती है, जिससे भूमि का मरुस्थलीकरण धीमा पड़ता है। यदि अरावली कमजोर होती है, तो इसका सीधा असर कृषि भूमि, वन क्षेत्र और मानव जीवन पर पड़ सकता है।
अरावली पहाड़ियों पर बढ़ते खतरे
- अवैध खनन
अरावली पहाड़ियों के लिए सबसे गंभीर खतरों में से एक अवैध खनन है। पत्थर, ग्रेनाइट और अन्य खनिजों की अवैध खुदाई से पहाड़ियों की प्राकृतिक संरचना को भारी नुकसान पहुंचता है। इससे न केवल भूमि क्षरण बढ़ता है, बल्कि आसपास के क्षेत्रों में धूल और प्रदूषण का स्तर भी काफी बढ़ जाता है।
अवैध खनन के कारण वर्षा जल को रोकने की अरावली की प्राकृतिक क्षमता कमजोर पड़ जाती है। जब पहाड़ों की चट्टानें और मिट्टी हट जाती हैं, तो पानी तेजी से बहकर निकल जाता है, जिससे भूजल रिचार्ज प्रभावित होता है। लंबे समय में इसका असर जल संकट और पर्यावरण असंतुलन के रूप में आता है।
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निर्माण गतिविधियाँ
तेजी से बढ़ती शहरी आबादी और विकास परियोजनाओं के कारण अरावली क्षेत्र में निर्माण गतिविधियाँ लगातार बढ़ रही हैं। सड़कें, रियल एस्टेट प्रोजेक्ट्स और अन्य ढांचागत विकास कार्य पहाड़ियों के प्राकृतिक स्वरूप को बदल रहे हैं। इससे हरित क्षेत्र कम हो रहा है और पर्यावरणीय दबाव बढ़ता जा रहा है।
निर्माण कार्यों के दौरान पहाड़ियों की कटाई और भूमि समतलीकरण से न केवल जैव विविधता को नुकसान होता है, बल्कि जल निकासी प्रणाली भी प्रभावित होती है। इसके परिणामस्वरूप बाढ़, जलभराव और मिट्टी कटाव जैसी समस्याएं उत्पन्न हो सकती हैं।
जंगल कटाई
अरावली पहाड़ियों में मौजूद जंगल इस क्षेत्र की जीवनरेखा माने जाते हैं, लेकिन लगातार हो रही जंगल कटाई से यह प्राकृतिक संतुलन बिगड़ता जा रहा है। पेड़ों की कटाई से वायु प्रदूषण बढ़ता है, तापमान में वृद्धि होती है और वन्यजीवों का प्राकृतिक आवास नष्ट होता है।
जंगलों की कमी का सीधा असर वर्षा चक्र और भूजल स्तर पर भी पड़ता है। पेड़-पौधे मिट्टी को बांधकर रखते हैं और वर्षा जल को जमीन में समाहित करने में मदद करते हैं। जब जंगल कटते हैं, तो भूमि तेजी से बंजर होने लगती है, जिससे अरावली क्षेत्र में मरुस्थलीकरण का खतरा और बढ़ जाता है।
निष्कर्ष (Conclusion)
अरावली पहाड़ियाँ केवल एक पर्वत श्रृंखला नहीं हैं, बल्कि दिल्ली-NCR और उत्तर भारत के पर्यावरण संतुलन की मजबूत आधारशिला हैं। ये पहाड़ियाँ वायु प्रदूषण को कम करने, भूजल स्तर बनाए रखने और बढ़ती गर्मी व मरुस्थलीकरण को रोकने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं। अरावली क्षेत्र में फैले जंगल और हरित आवरण पूरे इलाके के लिए प्राकृतिक सुरक्षा कवच की तरह काम करते हैं।
हालांकि, अवैध खनन, तेज़ी से बढ़ती निर्माण गतिविधियाँ और जंगल कटाई के कारण अरावली पहाड़ियों पर लगातार खतरा बढ़ता जा रहा है। यदि समय रहते इन गतिविधियों पर नियंत्रण नहीं किया गया, तो इसका सीधा असर दिल्ली-NCR की हवा, पानी और जलवायु पर पड़ेगा। इसलिए अरावली पहाड़ियों के महत्व को समझना और इनके संरक्षण के लिए जागरूकता बढ़ाना आज की सबसे बड़ी आवश्यकता है।
अक्सर पूछे जाने वाले सवाल (FAQ)
Q1. अरावली पहाड़ियाँ कहाँ स्थित हैं?
अरावली पहाड़ियाँ भारत के उत्तर-पश्चिमी भाग में स्थित हैं, जो राजस्थान से शुरू होकर हरियाणा और दिल्ली-NCR तक फैली हुई हैं।
Q2. अरावली पहाड़ियाँ दिल्ली-NCR के लिए क्यों जरूरी हैं?
अरावली पहाड़ियाँ प्रदूषण को कम करने, भूजल रिचार्ज में मदद करने और थार मरुस्थल से आने वाली गर्म व धूल भरी हवाओं को रोकने में अहम भूमिका निभाती हैं।
Q3. अरावली पहाड़ियों पर सबसे बड़ा खतरा क्या है?
अवैध खनन, अनियंत्रित निर्माण गतिविधियाँ और जंगल कटाई अरावली पहाड़ियों के लिए सबसे बड़े खतरे माने जाते हैं।
Q4. अरावली पहाड़ियों के नुकसान का आम लोगों पर क्या असर पड़ सकता है?
अरावली के कमजोर होने से वायु प्रदूषण बढ़ सकता है, जल संकट गहरा सकता है और गर्मी व हीटवेव जैसी समस्याएँ और गंभीर हो सकती हैं।
Q5. अरावली पहाड़ियों के संरक्षण के लिए क्या किया जा सकता है?
अवैध खनन पर सख्ती, नियंत्रित विकास, जंगलों का संरक्षण और जन जागरूकता बढ़ाकर अरावली पहाड़ियों को बचाया जा सकता है।
एक्टिविस्ट मांग कर रहे हैं कि सरकार भौगोलिक स्थिति, इकोलॉजी, वाइल्डलाइफ कनेक्टिविटी और क्लाइमेट रेजिलिएंस जैसे साइंटिफिक पैमानों का इस्तेमाल करके अरावली इलाकों को परिभाषित करे।
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