क्या कंपनियों में पहले से तय हो जाता है कि किसे मिलेगा प्रमोशन और किसे सिर्फ़ आश्वासन?
ऑफिस में अप्परैजल (Appraisal) का समय आते ही कई कर्मचारियों के मन में उत्साह से ज्यादा तनाव पैदा होने लगता है। पूरे साल मेहनत करने के बाद भी कई लोगों को यह महसूस होता है कि उनका मूल्यांकन पूरी ईमानदारी और निष्पक्षता से नहीं हो रहा।
कई कर्मचारियों का मानना है कि कुछ कंपनियों में पहले से ही यह तय कर लिया जाता है कि किसे अच्छी रेटिंग देनी है, किसे प्रमोशन मिलेगा और किसे सिर्फ़ “अभी और मेहनत करनी होगी” कहकर शांत कर दिया जाएगा। ऐसे माहौल में सबसे ज्यादा दबाव उन कर्मचारियों पर पड़ता है जो पूरी मेहनत और जिम्मेदारी के साथ काम करते हैं।
अप्परैजल (Appraisal) का समय और कर्मचारियों का बढ़ता तनाव
बढ़ता वर्क प्रेशर और मानसिक तनाव। कम समय में ज्यादा काम पूरा करने का दबाव। अप्परैजल के दौरान अक्सर कर्मचारियों पर अतिरिक्त काम का दबाव बढ़ा दिया जाता है।
- कम समय में ज्यादा काम पूरा करने की उम्मीद
- हर सप्ताह रिपोर्ट और अपडेट देने का दबाव
- छोटी-छोटी गलतियों पर लगातार निगरानी
- टीम के भीतर तुलना और प्रतिस्पर्धा
इन सब कारणों से कर्मचारियों का मानसिक तनाव धीरे-धीरे बढ़ने लगता है। कई लोग देर रात तक काम करते हैं, लेकिन फिर भी उन्हें यह डर बना रहता है कि कहीं उनकी मेहनत को नजरअंदाज न कर दिया जाए।
“Performance” के नाम पर बढ़ता दबाव (Toxic Work Culture)
जब मेहनत के बावजूद सुनने को मिले – “Improvement की जरूरत है”

कई बार मैनेजर कर्मचारियों से कहते हैं कि उनकी Performance धीमी है या उन्हें और बेहतर करने की जरूरत है, लेकिन स्पष्ट दिशा या पर्याप्त सहयोग नहीं दिया जाता। इससे कर्मचारी खुद को असुरक्षित महसूस करने लगता है।
सबसे ज्यादा मुश्किल स्थिति तब होती है जब किसी व्यक्ति को यह महसूस होने लगे कि निर्णय पहले ही लिया जा चुका है। ऐसे में उसका आत्मविश्वास कमजोर होने लगता है और काम के प्रति उत्साह भी धीरे-धीरे कम होने लगता है।
जब फैसले काम के आधार पर नहीं, बल्कि “अपने लोगों” के आधार पर होने लगें
कई बार सीनियर मैनेजमेंट सीधे कर्मचारी को जानते तक नहीं
कई कर्मचारियों का यह भी अनुभव रहता है कि अप्परैजल के समय अचानक ऊँचे पदों पर बैठे कुछ सीनियर अधिकारी – जैसे AVP या अन्य मैनेजमेंट लेवल के लोग – प्रक्रिया में शामिल हो जाते हैं।
सबसे बड़ी चिंता तब होती है, जब ये लोग उस कर्मचारी के रोज़ के काम, मेहनत और संघर्ष को सीधे जानते तक नहीं, लेकिन फिर भी उसकी रेटिंग और भविष्य पर बड़ा फैसला ले लेते हैं।
कई कर्मचारियों को ऐसा महसूस होता है कि कभी-कभी कम रेटिंग देकर पुराने कर्मचारियों को धीरे-धीरे किनारे किया जाता है, ताकि उनकी जगह “अपने लोगों” या पहले से परिचित व्यक्तियों को कंपनी में लाया जा सके।
जब कार्यस्थल पर योग्यता से ज्यादा “संबंध” महत्वपूर्ण दिखने लगें, तो मेहनत करने वाले कर्मचारियों का मनोबल टूटने लगता है।
उन्हें यह महसूस होने लगता है कि चाहे वे कितनी भी मेहनत कर लें, अंतिम निर्णय शायद पहले ही कहीं और तय हो चुका है।
कर्मचारियों के मन में पैदा होने लगती है असुरक्षा
ऐसे माहौल में कर्मचारी हर दिन एक डर के साथ काम करता है:
- “क्या मेरी नौकरी सुरक्षित है?”
- “क्या मेरी मेहनत की सही पहचान होगी?”
- “क्या मुझे सिर्फ़ Replace करने के लिए दबाव बनाया जा रहा है?”
यही असुरक्षा धीरे-धीरे मानसिक तनाव में बदल जाती है, जिसका असर व्यक्ति के आत्मविश्वास और निजी जीवन दोनों पर पड़ता है।
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ऑफिस का तनाव निजी जीवन को भी प्रभावित करता है

काम खत्म होने के बाद भी दिमाग शांत नहीं रहता
लगातार बढ़ते दबाव का असर सिर्फ ऑफिस तक सीमित नहीं रहता।
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“हर समय खुद को साबित करने का दबाव”
आज कई कर्मचारियों को ऐसा महसूस होता है कि उन्हें हर दिन खुद को साबित करना पड़ रहा है।
अगर एक छोटी गलती हो जाए, तो डर रहता है कि कहीं उसे Performance Issue न मान लिया जाए।कई लोग बाहर से सामान्य दिखते हैं, लेकिन अंदर ही अंदर लगातार तनाव, असुरक्षा और भविष्य की चिंता से जूझ रहे होते हैं।
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कॉर्पोरेट दुनिया में बढ़ती “Silent Stress Culture”
आज के कॉर्पोरेट माहौल में यह समस्या तेजी से बढ़ती दिखाई दे रही है। कर्मचारी अक्सर खुलकर अपनी परेशानी नहीं बता पाते, क्योंकि उन्हें डर रहता है कि कहीं उन्हें “Weak Performer” या “Negative Employee” न समझ लिया जाए।
धीरे-धीरे एक ऐसी “Silent Stress Culture” बनती जा रही है, जहाँ लोग मुस्कुराते हुए काम तो कर रहे हैं, लेकिन अंदर ही अंदर मानसिक दबाव से लड़ रहे होते हैं।
यही कारण है कि अब Work-Life Balance और Mental Health जैसे मुद्दों पर पहले से ज्यादा चर्चा होने लगी है।
- परिवार के साथ समय बिताने के बावजूद मन काम में उलझा रहता है
- हर मीटिंग और कॉल से पहले चिंता महसूस होती है
- व्यक्ति मानसिक रूप से थका हुआ महसूस करने लगता है
आज के कॉर्पोरेट माहौल में यह समस्या तेजी से बढ़ती दिखाई दे रही है।
कर्मचारियों को क्या करना चाहिए?
खुद को मानसिक रूप से मजबूत रखना भी जरूरी
ऐसी परिस्थितियों में कर्मचारियों को भावनात्मक रूप से टूटने के बजाय अपने काम का रिकॉर्ड मजबूत रखना चाहिए।
- अपने योगदान और उपलब्धियों का सही दस्तावेज तैयार रखें
- ईमेल और कार्य अपडेट व्यवस्थित रखें
- फीडबैक को शांत मन से समझें
- नई स्किल सीखते रहें और खुद को बेहतर बनाते रहें
क्योंकि कई बार परिस्थितियाँ तुरंत नहीं बदलतीं, लेकिन लगातार सीखने वाला व्यक्ति भविष्य में बेहतर अवसर जरूर हासिल करता है।
“आज कई बड़ी कंपनियाँ Whistleblower Policy और Anonymous Complaint Mechanism जैसी व्यवस्थाएँ लागू कर रही हैं, ताकि कर्मचारी बिना डर अपनी बात रख सकें। हालांकि, कर्मचारियों के बीच आज भी यह चिंता बनी रहती है कि उनकी पहचान पूरी तरह सुरक्षित रहेगी या नहीं।”
इसमें anonymous complaint process और ethics mechanism समझाया गया है।
Note: ऐसी policies आमतौर पर corruption, unethical conduct, harassment, policy violations के लिए बनाई जाती हैं।
(लेकिन कई कंपनियाँ performance appraisal या promotion disputes को whistleblower category में नहीं मानतीं।)
निष्कर्ष:
अप्परैजल का समय कर्मचारियों के लिए प्रेरणा और सम्मान का अवसर होना चाहिए, न कि डर और मानसिक तनाव का कारण।
जरूरत इस बात की है कि कंपनियाँ केवल Performance Numbers पर नहीं, बल्कि कर्मचारियों की मेहनत, मानसिक स्थिति और निष्पक्ष मूल्यांकन पर भी ध्यान दें।
क्योंकि हर कर्मचारी सिर्फ एक “Resource” नहीं होता, बल्कि वह एक इंसान होता है, जिसकी मेहनत के साथ-साथ उसकी मानसिक शांति भी उतनी ही महत्वपूर्ण है।
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