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एक युग का अंत18 साल और 10 बार शपथ अब नीतीश कुमार की विदाई

बिहार की राजनीति में एक युग का अंत एक युग का अंत18 साल और 10 बार शपथ अब नीतीश कुमार की विदाई – क्या ‘सुशासन बाबू’ की कमी भर पाएगी? आइये उनके जीवन के प्रेरणा भरे अहम फैसले को साझा करें।

“बिहार की राजनीति में मंगलवार का दिन एक ऐसी तारीख के रूप में दर्ज हो गया, जिसने दशकों से चली आ रही एक परंपरा को विराम दे दिया। मुख्यमंत्री आवास से जब नीतीश कुमार इस्तीफे की चिट्ठी लेकर राजभवन की ओर बढ़े, तो वह केवल एक नेता का पद छोड़ना नहीं था, बल्कि बिहार के उस ‘सुशासन बाबू’ के युग का अंत था जिसने राज्य को गड्ढों वाली सड़कों से निकालकर ‘साइकिल वाली बेटियों’ के बिहार तक पहुँचाया। आज हर बिहारी के मन में एक ही सवाल है— क्या नीतीश कुमार के बिना बिहार की राजनीति वैसी ही रहेगी?”

 2005 से 2026: एक लंबा और ऐतिहासिक सफर। 10 बार शपथ लेना उनकी राजनीतिक कुशलता को दर्शाता है।

10 बार मुख्यमंत्री पद की शपथ लेना भारतीय राजनीति में कोई साधारण बात नहीं है। यह उनकी उस अद्भुत राजनीतिक क्षमता को दर्शाता है जिसके कारण वे हमेशा सत्ता के केंद्र में बने रहे।

 राजनीति के ‘अजेय’ योद्धा: 10 बार शपथ और अटूट विश्वास

“नीतीश कुमार जी के नाम दर्ज यह रिकॉर्ड केवल एक संख्या नहीं है, बल्कि उनकी उस राजनीतिक समझ का प्रमाण है जिसे उनके विरोधी भी सलाम करते हैं। उतार-चढ़ाव आए, गठबंधन बदले, साथी बदले, लेकिन बिहार की जनता और राजनीति ने हमेशा नीतीश कुमार पर भरोसा जताया। 10 बार मुख्यमंत्री के रूप में शपथ लेना यह साबित करता है कि वे जानते हैं कि बिहार की नब्ज कैसे पकड़ी जाती है।” 

 “10 बार शपथ लेना केवल सत्ता का मोह नहीं, बल्कि बिहार की उस मिट्टी का भरोसा है जो हर बार अपने ‘नीतीश’ को पुकारती रही।”

 उनकी खासियत। 

  • लचीलापन (Adaptability): बदलती राजनीतिक परिस्थितियों में खुद को ढालने की कला।

  • विकास का चेहरा: गठबंधन कोई भी हो, उन्होंने हमेशा ‘विकास’ को ही अपना मुख्य मुद्दा रखा।

  • किंगमेकर से किंग तक: वे न केवल खुद किंग बने रहे, बल्कि बिहार की राजनीति किसके इर्द-गिर्द घूमेगी, यह भी वही तय करते रहे।

 “नीतीश कुमार के 5 सबसे बड़े ऐतिहासिक फैसले”

  • साइकिल योजना: जिसने स्कूल ड्रॉपआउट रेट खत्म किया।

  • हर घर नल का जल: गांवों तक साफ पानी पहुँचाना।

  • बिजली सुधार: लालटेन युग को खत्म कर हर घर को रोशन करना।

  • सड़क और पुल: बिहार के सुदूर इलाकों को पटना से जोड़ना।

  • पुलिस भर्ती में आरक्षण: बिहार पुलिस में आज देश में सबसे ज्यादा महिलाकर्मी हैं।

“नीतीश कुमार की सबसे बड़ी खूबी यह रही कि उन्होंने बिहार की राजनीति को ‘जाति’ के जाल से निकालकर ‘विकास’ (Development) की मेज पर लाकर खड़ा कर दिया। उनके कार्यकाल में बनी सड़कें और फ्लाईओवर आज अक्सर जनता में चर्चा का विषय रहता है। केवल कंक्रीट के ढांचे नहीं हैं, बल्कि वे बिहार की बदलती उम्मीदों के गवाह हैं। भले ही आलोचक उनके गठबंधन बदलने पर सवाल उठाएं, लेकिन उनके द्वारा शुरू की गई ‘सात निश्चय’ जैसी योजनाएँ  देश के कई राज्यों के लिए एक रोल मॉडल बनी हुई हैं।”

 

उनके कार्यकाल को टेबल के नजरिये से आसानी  समझते हैं। 

शपथ का क्रम साल मुख्य उपलब्धि
पहली बार 2000  केवल 7 दिनों का कार्यकाल, लेकिन संघर्ष की शुरुआत
दूसरी बार 2005 सुशासन बाबू की छवि और विकास का दौर
तीसरी बार 2010 विकास की गति तेज हुई, सड़कों और बिजली पर ऐतिहासिक काम।
चौथी बार 2015  महागठबंधन (RJD के साथ) के साथ वापसी और ‘7-निश्चय’ का आगाज़।
पांचवी बार  2015  जीत के बाद विधिवत मुख्यमंत्री के रूप में नई पारी की शुरुआत।
छठी बार  2017   फिर से NDA के साथ वापसी और ‘न्याय के साथ विकास’ का नारा।
सातवीं बार  2020   कोरोना काल के बीच सत्ता संभाली और स्वास्थ्य सेवाओं पर जोर दिया।
आठवीं बार  2020   चुनाव नतीजों के बाद एनडीए गठबंधन के नेता के रूप में शपथ।
नवमी बार  2022   फिर से पाला बदलकर महागठबंधन के साथ सरकार बनाई।
10वीं बार 2024 सबसे अनुभवी मुख्यमंत्री का रिकॉर्ड

भारत सरकार के आधिकारिक न्यूज़ चैनल की रिपोर्ट देखें।

(यह तालिका गवाह है कि बिहार की राजनीति की धुरी पिछले दो दशकों से केवल नीतीश कुमार के इर्द-गिर्द ही घूमती रही है।)

“कुर्सियां तो आती-जाती रहेंगी, पर बिहार के इतिहास के पन्नों पर ‘सुशासन’ की जो इबारत नीतीश कुमार ने लिखी है, उसे मिटाना नामुमकिन है।”

कैसे नितीश बाबू शून्य से शिकर तक (उनका शुरुआती संघर्ष रहा) 

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जेपी के नेतृत्व में ‘संपूर्ण क्रांति’ का शंखनाद हुआ। उस समय एक युवा इंजीनियर के मन में देश और समाज के लिए कुछ कर गुजरने का हौसला उड़ान भरने लगा।

इंजीनियरिंग से सियासत तक: बख्तियारपुर का वो साधारण लड़का जिन्हे हर इंसान आज याद कर रहा। 

नीतीश कुमार का जन्म 1 मार्च 1951 को बिहार के बख्तियारपुर के एक बेहद साधारण परिवार में हुआ था। उनके पिता, कविराज राम लखन सिंह, एक स्वतंत्रता सेनानी और हकीम थे। घर का माहौल सादगी और देशप्रेम से भरा था, जिसने नीतीश जी के व्यक्तित्व में अनुशासन और ईमानदारी के बीज बोए।

1. जब ‘मुन्ना’ इंजीनियर बनने निकला

बचपन में प्यार से ‘मुन्ना’ कहे जाने वाले नीतीश कुमार पढ़ाई में बहुत मेधावी थे। उन्होंने बिहार कॉलेज ऑफ इंजीनियरिंग (अब NIT पटना) से इलेक्ट्रिकल इंजीनियरिंग की पढ़ाई की। उस दौर में एक इंजीनियर के लिए सरकारी नौकरी पाना बहुत आसान था, और उनके पास एक आरामदायक जीवन जीने के सभी रास्ते खुले थे। लेकिन नियति को कुछ और ही मंजूर था।

 

2. जेपी आंदोलन: जब बदली जीवन की दिशा

1970 का दशक भारत की राजनीति में उथल-पुथल का समय था। जयप्रकाश नारायण (जेपी) के नेतृत्व में ‘संपूर्ण क्रांति’ का शंखनाद हुआ। उस समय एक युवा इंजीनियर के मन में देश और समाज के लिए कुछ करने की तड़प उठी। वे जेपी आंदोलन से जुड़ गए और यहीं से उनके राजनीतिक जीवन की नींव पड़ी।

सोचिए, एक हाथ में इंजीनियरिंग की डिग्री और दूसरे हाथ में समाज बदलने का जुनून। उन्होंने बिजली के तारों को सुलझाने के बजाय, बिहार की उलझी हुई व्यवस्था को सुलझाने का कठिन रास्ता चुना।

3. संघर्ष के दिन और जेल यात्रा

आंदोलन के दौरान उन्हें जेल भी जाना पड़ा, लेकिन उन्होंने हार नहीं मानी। उन्होंने राजनीति को केवल सत्ता पाने का जरिया नहीं, बल्कि सेवा का माध्यम माना। लोहिया और जेपी के विचारों ने उन्हें एक ऐसी दृष्टि दी, जिससे वे आगे चलकर बिहार के ‘सुशासन बाबू’ बने।

“आज जब हम उन्हें मुख्यमंत्री की कुर्सी पर देखते हैं, तो हमें अक्सर उनके पीछे का वो संघर्ष याद नहीं रहता। बख्तियारपुर की गलियों से निकलकर, इंजीनियरिंग की किताबों को छोड़कर, पटना की सड़कों पर आंदोलन करने वाला वो युवा आज बिहार के इतिहास का सबसे बड़ा नाम बन चुका है। यह सफर हमें सिखाता है कि अगर इरादे मजबूत हों, तो एक साधारण परिवार का लड़का भी पूरे राज्य का भाग्य बदल सकता है।”

पाठकों के लिए सवाल:

“दोस्तों, आपको क्या लगता है? क्या नीतीश कुमार के बिना बिहार का विकास इसी रफ्तार से जारी रहेगा? और उनकी जगह अगला मुख्यमंत्री किसे होना चाहिए—सम्राट चौधरी या कोई और? अपनी राय हमें कमेंट बॉक्स में जरूर बताएं और इस आर्टिकल को शेयर करें ताकि और लोग भी अपनी बात रख सकें।”

 

निष्कर्ष: क्या बिहार अब भी पुकारेगा ‘नीतीश’?

“नीतीश कुमार का मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा देना केवल एक राजनैतिक घटना नहीं है, बल्कि बिहार के इतिहास का एक बड़ा मोड़ है। 18 सालों तक सत्ता के शिखर पर रहते हुए उन्होंने बिहार को ‘जंगलराज’ की छवि से निकालकर ‘सुशासन’ की राह पर खड़ा किया। आज जब वे राज्यसभा की ओर अपना रुख कर रहे हैं, तो पीछे छूट रही है उनकी वो विरासत—जिसमें सड़कों का जाल है, हर घर में बिजली है और सबसे बढ़कर, बिहार की बेटियों के हाथों में स्वाभिमान की वो चाबी है जो उन्होंने शिक्षा के जरिए उन्हें सौंपी थी।

हो सकता है कि आने वाले समय में बिहार की गद्दी पर कोई नया चेहरा नजर आए, लेकिन ‘सुशासन बाबू’ के उन 10 शपथों की गूँज हमेशा याद रखी जाएगी। नीतीश कुमार ने साबित किया कि राजनीति केवल जोड़-तोड़ का खेल नहीं, बल्कि धैर्य और विकास का भी नाम है।”

 

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