SC/ST Act में मोदी सरकार के 2018 संशोधन के बाद क्यों सड़कों पर उतरा था सवर्ण समाज?

SC/ST Act और इसके दुरुपयोग पर क्या है बहस?

SC/ST Act और इसके दुरुपयोग पर क्या है बहस? जानें सवर्ण समाज की माँगे और कानूनी स्थिति।

भारतीय कानून और संविधान का मुख्य उद्देश्य समाज के हर वर्ग को सुरक्षा और समानता देना है। इसी दिशा में अनुसूचियों और वंचित वर्गों को सामाजिक उत्पीड़न से बचाने के लिए ‘अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम’ (SC/ST Prevention of Atrocities Act) लागू किया गया था।

हालांकि, पिछले कुछ सालों में इस कानून के प्रावधानों, इसके कथित दुरुपयोग और बिना जांच के होने वाली गिरफ्तारियों को लेकर सवर्ण समाज और कई सामाजिक संगठनों द्वारा चिंताएं जताई जाती रही हैं। कई मौकों पर विरोध प्रदर्शनों के दौरान इसे “काला कानून” तक कहकर संबोधित किया गया है।

आइए जानते हैं कि इस कानून को लेकर विवाद क्या है, सवर्ण समाज की मुख्य मांगें क्या हैं और इस पर न्यायपालिका का क्या रुख रहा है।

1. SC/ST एक्ट क्या है और इसे क्यों बनाया गया था?

यह कानून वर्ष 1989 में संसद द्वारा पारित किया गया था। इसका मुख्य उद्देश्य समाज में अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति के लोगों के खिलाफ होने वाले जातिगत भेदभाव, उत्पीड़न और अपराधों को रोकना था।

इस कानून की मुख्य विशेषताएँ:

  • गैर-जमानती (Non-Bailable) अपराध की श्रेणी में मामला दर्ज होना।

  • पीड़ित को तुरंत सरकारी सहायता और मुआवजा मिलना।

  • मामलों के त्वरित निपटारे के लिए विशेष अदालतों (Special Courts) का गठन।

2. सवर्ण समाज की मुख्य चिंताएं और विवाद का कारण

आज सवर्ण समाज की प्रमुख मांगें क्या हैं?

सवर्ण समाज और इस कानून में बदलाव की मांग करने वाले लोगों का मानना है कि जहां निर्दोषों की रक्षा आवश्यक है, वहीं इस कानून के कुछ कठोर प्रावधानों का दुरुपयोग भी देखने को मिला है। मुख्य चिंताएं निम्नलिखित हैं:

  • बिना प्राथमिक जांच के तुरंत गिरफ्तारी: शिकायत दर्ज होते ही आरोपी की त्वरित गिरफ्तारी का प्रावधान, जिससे कई बार पारिवारिक या व्यक्तिगत दुश्मनी के मामलों में भी निर्दोष लोग जेल चले जाते हैं।

  • अग्रिम जमानत (Anticipatory Bail) पर रोक: इस कानून की धारा 18 के तहत आरोपी को आसानी से अग्रिम जमानत नहीं मिलती, जिससे मुकदमे की सुनवाई पूरी होने तक व्यक्ति को जेल में रहना पड़ता है।

  • झूठे मुकदमों की आशंका: कई मामलों में आपसी विवाद, संपत्ति के झगड़ों या राजनीतिक रंजिश को जातिगत विवाद का रूप देकर मामला दर्ज कराने के आरोप सामने आए हैं।

3. सुप्रीम कोर्ट का 2018 का ऐतिहासिक फैसला और संसद का संशोधन

इस मुद्दे पर सबसे बड़ी बहस 2018 में शुरू हुई थी, जब सुप्रीम कोर्ट और केंद्र सरकार के फैसलों के बाद देश भर में सामाजिक आंदोलन देखने को मिले।

  • सुप्रीम कोर्ट का निर्णय (मार्च 2018): शीर्ष अदालत ने दुरुपयोग को रोकने के लिए व्यवस्था दी थी कि किसी भी शिकायत पर तुरंत गिरफ्तारी न हो। पहले डीएसपी (DSP) स्तर के अधिकारी द्वारा प्राथमिक जाँच की जाए और लोक सेवकों की गिरफ्तारी से पहले सक्षम प्राधिकारी की अनुमति ली जाए।

  • संसद का संशोधन (अगस्त 2018): विभिन्न संगठनों और वर्गों के विरोध के बाद संसद ने कानून में संशोधन (Section 18A) करके सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले को पलट दिया और पुरानी स्थिति (तुरंत गिरफ्तारी और बिना प्राथमिक जाँच के एफआईआर) को बहाल कर दिया।

 

“सुप्रीम कोर्ट ने 20-मार्च-2018 को सुप्रीम कोर्ट का ऐतिहासिक फैसला सुनाते हुए गिरफ्तारी से पहले प्राथमिक जाँच को अनिवार्य किया था।”

जातिगत जनगणना और आरक्षण: इसका जनता पर क्या असर हो सकता है?

 

इसी संशोधन के बाद सवर्ण समाज के कई संगठनों ने इसका कड़ा विरोध किया और इसे मौलिक अधिकारों का हनन मानते हुए इसके खिलाफ आवाज उठाई।

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एनसीआरबी (NCRB) का डेटा: राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो के आंकड़ों के अनुसार, हर साल कई ऐसे मामले दर्ज होते हैं जो बाद में पुलिस जांच या अदालती कार्यवाही के दौरान साक्ष्यों के अभाव या झूठे पाए जाने के कारण खारिज (False / Unfounded Cases) हो जाते हैं।

4. आज के मुख्य मुद्दे और सवर्ण समाज की चिंताएं

आज भी जगह-जगह जो विरोध और ज्ञापन देने के मामले सामने आते हैं, उनके पीछे मुख्य रूप से निम्नलिखित कारण हैं:

झूठे मुकदमों (Fake FIRs) का आरोप

आज के समय में सबसे बड़ा मुद्दा संपत्ति के विवाद, आपसी रंजिश या व्यावसायिक लेन-देन के मामलों में इस कानून के गलत इस्तेमाल का है। समाज के लोगों का कहना है कि बिना किसी शुरुआती जांच के एफआईआर दर्ज होने से निर्दोष व्यक्ति को जेल जाना पड़ता है और उसकी सामाजिक प्रतिष्ठा को भारी नुकसान पहुंचता है।

 EWS आरक्षण की शर्तों पर सवाल

10% EWS (आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग) आरक्षण लागू होने के बावजूद, आज भी सवर्ण समाज इसकी कठिन शर्तों (जैसे आय सीमा, संपत्ति के मानक और अन्य नियम) में ढील और संशोधन की मांग कर रहा है, ताकि इसका सही लाभ वास्तविक जरूरतमंदों को मिल सके।

 निष्पक्ष जांच और समानता की माँग

संगठनों की मांग है कि कानून न्याय के लिए होना चाहिए, न कि किसी एक वर्ग के खिलाफ हथियार के रूप में। अगर कोई व्यक्ति जानबूझकर किसी निर्दोष पर झूठा मामला दर्ज कराता है, तो उसके खिलाफ भी सख्त कानूनी कार्रवाई का प्रावधान होना चाहिए।

कितने निर्दोष प्रभावित हुए? जानिए क्या कहते हैं आंकड़े और अदालतें

इस कानून के दुरुपयोग के कारण अब तक कितने निर्दोष लोगों का जीवन या करियर प्रभावित हुआ है, इसका कोई एक सटीक या अलग से आधिकारिक राष्ट्रीय आंकड़ा (Statistical Figure) उपलब्ध नहीं है। हालांकि, न्यायपालिका की टिप्पणियों और उपलब्ध रिपोर्टों से इसकी गंभीरता को समझा जा सकता है:

अदालतों की टिप्पणियां: सुप्रीम कोर्ट और कई उच्च न्यायालयों (High Courts) ने विभिन्न मुकदमों की सुनवाई के दौरान यह माना है कि आपसी रंजिश, संपत्ति विवाद या व्यक्तिगत रंजिश के मामलों में इस कानून के कठोर प्रावधानों का दुरुपयोग देखा गया है। इसी चिंता के आधार पर अदालत ने निष्पक्ष जांच की आवश्यकता पर बल दिया था।

एनसीआरबी (NCRB) का डेटा: राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो के आंकड़ों के अनुसार, हर साल कई ऐसे मामले दर्ज होते हैं जो बाद में पुलिस जांच या अदालती कार्यवाही के दौरान साक्ष्यों के अभाव या झूठे पाए जाने के कारण खारिज (False / Unfounded Cases) हो जाते हैं।

सामाजिक व मानसिक प्रभाव: कानून विशेषज्ञों का मानना है कि किसी व्यक्ति पर गंभीर धाराएं लगने से सुनवाई पूरी होने तक उसकी सामाजिक प्रतिष्ठा, नौकरी, और मानसिक स्थिति पर गहरा प्रतिकूल असर पड़ता है।

इसी वजह से सामाजिक संगठनों और सवर्ण समाज की यह प्रमुख मांग रही है कि शिकायत दर्ज होते ही गिरफ्तारी के बजाय पहले एक निष्पक्ष प्राथमिक जांच (Preliminary Inquiry) जरूर की जाए, ताकि किसी भी निर्दोष व्यक्ति के अधिकारों का हनन न हो।

निष्कर्ष:

किसी भी कल्याणकारी राज्य में ऐसा कानून होना आवश्यक है जो कमजोर और वंचित वर्गों की सुरक्षा करे। हालांकि, इसके साथ ही यह सुनिश्चित करना भी न्याय व्यवस्था की जिम्मेदारी है कि किसी निर्दोष व्यक्ति के मौलिक अधिकारों का हनन न हो।

कानून की मंशा किसी का उत्पीड़न करना नहीं, बल्कि न्याय दिलाना है। इसलिए, SC/ST अधिनियम के मूल उद्देश्य को बनाए रखते हुए इसके दुरुपयोग को रोकने के लिए ठोस दिशा-निर्देश और निष्पक्ष जाँच  प्रक्रिया ही इस विवाद का स्थायी और संतुलित समाधान हो सकती है।

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