भगवान श्रीकृष्ण ने उत्तरा के गर्भ में प्रवेश करके अपने सभी पुण्यों का फल अर्पित किया

Jitiya Vrat 2026 Date: जितिया व्रत कब है? कथा पूजा मुहूर्त

Jitiya Vrat 2026 Date: जितिया व्रत कब है? जानें सही तिथि, नहाय-खाय, पौराणिक कथा पूजा मुहूर्त और पारण का समय। 

Jitiya Vrat 2026 Date: जितिया व्रत कब है? कथा पूजा मुहूर्त हिंदू धर्म में संतान की लंबी उम्र, अच्छी सेहत और सुख-समृद्धि के लिए रखे जाने वाले व्रतों में जीवित्पुत्रिका व्रत (जितिया व्रत) का विशेष महत्व है। यह व्रत मुख्य रूप से उत्तर प्रदेश, बिहार, झारखंड और नेपाल के क्षेत्रों में बड़ी श्रद्धा के साथ मनाया जाता है।

जितिया का व्रत माताएं अपनी संतान की रक्षा के लिए 24 घंटे से भी अधिक समय तक निर्जला (बिना अन्न-जल) रहकर रखती हैं। आइए जानते हैं कि वर्ष 2026 में जितिया व्रत की सही तारीख क्या है, नहाय-खाय कब है और पारण का शुभ समय क्या रहेगा।

जितिया व्रत 2026 कब है? (Jitiya Vrat 2026 Date)

हिंदू पंचांग के अनुसार, जितिया व्रत हर साल आश्विन माह के कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि को रखा जाता है। वर्ष 2026 में यह व्रत शनिवार, 3 अक्टूबर 2026 को रखा जाएगा।

महत्वपूर्ण तिथियां और मुहूर्त (Jitiya 2026 Calendar):

  • नहाय-खाय (पहला दिन): शुक्रवार, 2 अक्टूबर 2026

  • निर्जला व्रत (मुख्य दिन): शनिवार, 3 अक्टूबर 2026

  • व्रत का पारण (तीसरा दिन): रविवार, 4 अक्टूबर 2026

  • अष्टमी तिथि का प्रारंभ: 3 अक्टूबर 2026 को सुबह 07:59 बजे से

  • अष्टमी तिथि का समापन: 4 अक्टूबर 2026 को सुबह 05:51 बजे तक

दृक पंचांग के अनुसार:  जीवित्पुत्रिका व्रत शुभ मुहूर्त 

जितिया व्रत का 3 दिवसीय नियम (3 Days of Jitiya Vrat)

जितिया का पर्व केवल एक दिन का न होकर तीन दिनों तक चलने वाला अनुष्ठान है:

1. पहला दिन – नहाय-खाय (2 अक्टूबर 2026)

इस दिन व्रती महिलाएं सूर्योदय से पहले उठकर स्नान-ध्यान करती हैं और सात्विक भोजन ग्रहण करती हैं। भोजन में मड़ुआ की रोटी, नोनी का साग और झिंगुनी की सब्जी बनाने की विशेष परंपरा है।

2. दूसरा दिन – निर्जला व्रत (3 अक्टूबर 2026)

यह मुख्य व्रत का दिन होता है। इस दिन महिलाएं पूरे दिन और पूरी रात बिना जल और अन्न के रहती हैं। शाम को भगवान जीमूतवाहन, चील और सियारिन की पूजा की जाती है।

3. तीसरा दिन – पारण (4 अक्टूबर 2026)

सूर्योदय के बाद और अष्टमी तिथि समाप्त होने के उपरांत व्रत का पारण किया जाता है। इसके बाद ही व्रती महिलाएं जल और अन्न ग्रहण करती हैं।

जितिया पूजा विधि (Jitiya Puja Vidhi)

  1. सुबह का स्नान: व्रत के दिन सुबह स्नान करके स्वच्छ वस्त्र धारण करें और व्रत का संकल्प लें।

  2. पूजा का स्थान: घर के आंगन या पूजा कक्ष में मिट्टी से छोटी सी पोखरी बनाएं। 

  3. मूर्ति या प्रतीक: पोखरी के पास पाकड़ की डाल खड़ी करें और उस पर मिट्टी या गोबर से बनी चील और सियारिन की आकृति स्थापित करें।

  4. भगवान जीमूतवाहन की पूजा: कुश से बनी राजा जीमूतवाहन की प्रतिमा स्थापित करें और उन्हें धूप, दीप, फूल, फल, अक्षत और माला अर्पित करें।

  5. कथा श्रवण: पूजा के समय जीवित्पुत्रिका व्रत कथा जरूर सुनें या पढ़ें।

या अपनी श्रद्धा अनुसार अपने घरेलू परम्परा के अनुरूप व्रत करें। कई बार देखा गया है अपने घर से बाहर पोखरी की परम्परा रही है। 

जीवित्पुत्रिका (जितिया) व्रत कथा इस प्रकार है।

जीवित्पुत्रिका व्रत की मुख्य रूप से दो पौराणिक कथाएं प्रचलित हैं: पहली गंधर्व राजकुमार जीमूतवाहन की और दूसरी महाभारत काल में भगवान श्रीकृष्ण द्वारा उत्तरा के गर्भ की रक्षा की।

1. जीमूतवाहन, चील और सियारिन की कथा

गंधर्वों के राजा जीमूतवाहन बहुत ही दयालु, धर्मात्मा और परोपकारी थे। वे अपना राजपाठ अपने भाइयों को सौंपकर वन में पिता की सेवा करने चले गए। वहीं उनका विवाह नागकन्या मलयवती से हुआ।

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जीमूतवाहन ने एक वृद्धा (नागमाता) को रोते हुए देखा और उनके संतान की रक्षा की।

Jitiya Vrat 2026 Date: जितिया व्रत कब है? कथा पूजा मुहूर्त

एक दिन वन में भ्रमण करते हुए जीमूतवाहन ने एक वृद्धा (नागमाता) को रोते हुए देखा। कारण पूछने पर वृद्धा ने बताया, “पक्षियों के राजा गरुड़ को प्रसन्न रखने के लिए नागवंश ने यह समझौता किया है कि वे प्रतिदिन एक नाग को गरुड़ के भोजन के लिए भेजेंगे। आज मेरे इकलौते पुत्र शंखचूड़ की बारी है।”

यह सुनकर जीमूतवाहन ने वृद्धा को सांत्वना दी और कहा, “आप चिंता न करें, आज आपके पुत्र के प्राणों की रक्षा के लिए मैं स्वयं लाल कपड़े में लिपटकर गरुड़ की वध-शीला पर लेटूँगा।”

जीमूतवाहन वध-शीला पर लेट गए। जब गरुड़ आए और अपने पंजों से जीमूतवाहन को उठाकर ले जाने लगे, तो उन्होंने देखा कि यह व्यक्ति रोने या डरने के बजाय शांत है। गरुड़ ने रुककर उनका परिचय पूछा। जीमूतवाहन ने पूरी बात सच-सच बता दी।

जीमूतवाहन का यह असीम साहस और परोपकार देखकर गरुड़ अत्यंत प्रसन्न हुए। उन्होंने जीमूतवाहन को जीवनदान दिया और नागों को भविष्य में न खाने का वचन भी दिया। इस प्रकार जीमूतवाहन के त्याग से नाग जाति और शंखचूड़ की रक्षा हुई। तभी से राजा जीमूतवाहन की पूजा संतान की लंबी उम्र और रक्षा के लिए की जाने लगी।

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चील और सियारिन का प्रसंग

इसी वन में एक चील और एक सियारिन भी रहती थीं। दोनों ने मिलकर जितिया का निर्जला व्रत रखने का संकल्प लिया।

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शीलवती के सभी पुत्र जीवित और दीर्घायु रहे क्योंकि उसने पूर्व जन्म में जितिया व्रत का पूरी निष्ठा से पालन किया था। वहीं, कपूरी के सभी बच्चे जन्म लेते ही मृत हो जाते थे। जब कपूरी को अपने पूर्वजन्म के व्रत भंग करने का रहस्य पता चला
  • चील ने पूरे भक्तिभाव और कठोरता से निर्जला व्रत नियमपूर्वक पूरा किया।

  • सियारिन को रात में भूख सहन नहीं हुई और उसने चुपके से श्मशान में जाकर मांस खा लिया, जिससे उसका व्रत खंडित हो गया।

अगले जन्म में दोनों ने बहन के रूप में जन्म लिया। चील की आत्मा ने शीलवती के रूप में जन्म लिया और सियारिन की आत्मा ने कपूरी के रूप में। शीलवती के सभी पुत्र जीवित और दीर्घायु रहे क्योंकि उसने पूर्व जन्म में जितिया व्रत का पूरी निष्ठा से पालन किया था। वहीं, कपूरी के सभी बच्चे जन्म लेते ही मृत हो जाते थे। जब कपूरी को अपने पूर्वजन्म के व्रत भंग करने का रहस्य पता चला, तो उसने पश्चाताप किया। इसलिए यह व्रत बिना अन्न-जल के पूर्ण निष्ठा से रखा जाता है।

पौराणिक कथा और इतिहास के लिए:  Wikipedia (विकिपीडिया) में भी वर्णन है। 

2. महाभारत कालीन कथा (अश्वत्थामा और उत्तरा का प्रसंग)

महाभारत युद्ध के अंत में अपने पिता द्रोणाचार्य की मृत्यु का बदला लेने के लिए अश्वत्थामा ने पांडवों के शिविर पर हमला कर दिया। उसने धोखे से पांडवों के पुत्रों की हत्या कर दी।

जब अश्वत्थामा को पता चला कि अभिमन्यु की पत्नी उत्तरा के गर्भ में पांडव वंश का अंतिम वारिस पल रहा है, तो उसने उसे नष्ट करने के लिए ब्रह्मास्त्र चला दिया।

भगवान श्रीकृष्ण ने उत्तरा के गर्भ में प्रवेश करके अपने सभी पुण्यों का फल अर्पित किया और उस बालक को पुनर्जीवित कर दिया। गर्भ में जीवित रहने के कारण उस बालक का नाम परीक्षित पड़ा।

भगवान श्रीकृष्ण की इस कृपा और चमत्कार के कारण आश्विन कृष्ण अष्टमी तिथि को जीवित्पुत्रिका (जितिया) के रूप में मनाया जाने लगा, ताकि माताओं की संतान पर आने वाला हर संकट दूर हो सके।

जितिया व्रत का धार्मिक महत्व (Significance of Jitiya Vrat)

पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, महाभारत काल में भगवान श्रीकृष्ण ने उत्तरा के गर्भ में पल रहे शिशु (परीक्षित) की रक्षा के लिए अपने पुण्यों का फल दिया था। तब से ही संतान की रक्षा और लंबी आयु की कामना के लिए जीवित्पुत्रिका व्रत रखने की परंपरा चली आ रही है। राजा जीमूतवाहन की कृपा से संतान को आरोग्य और दीर्घायु का वरदान मिलता है।

 जितिया व्रत कथा सुनने मात्र से माताओं की संतान को दीर्घायु, उत्तम स्वास्थ्य और जीवन में सफलता का आशीर्वाद प्राप्त होता है।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs):

Q1. जितिया व्रत 2026 में कब है?

Ans: जितिया व्रत 3 अक्टूबर 2026, शनिवार को रखा जाएगा।

Q2. जितिया व्रत का पारण कब किया जाएगा?

Ans: जितिया व्रत का पारण 4 अक्टूबर 2026 को सुबह 05:51 बजे अष्टमी तिथि समाप्त होने के बाद किया जाएगा।

Q3. जितिया व्रत में किसकी पूजा होती है?

Ans: जितिया व्रत में राजा जीमूतवाहन के साथ-साथ चील और सियारिन की पूजा की जाती है।

(अस्वीकरण: इस लेख में दी गई जानकारियां धार्मिक पंचांग और मान्यताओं पर आधारित हैं। विस्तृत जानकारी के लिए अपने स्थानीय पंडित या ज्योतिषी से परामर्श लें।)

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AK Pandey
AK Pandey
2 years ago

Good information