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गुरु गोबिंद सिंह जयंती जानें इतिहास और खालसा पंथ की स्थापना

गुरु गोबिंद सिंह जयंती 2026-2027: जानें तिथि, इतिहास, महत्व और खालसा पंथ की स्थापना

सिख धर्म के 10वें और अंतिम मानव गुरु, श्री गुरु गोबिंद सिंह जी की जयंती (प्रकाश पर्व) सिख समाज का एक अत्यंत पवित्र त्यौहार है। गुरु गोबिंद सिंह जी न केवल एक महान आध्यात्मिक गुरु थे, बल्कि वे एक अद्भुत योद्धा, कवि और समाज सुधारक भी थे।

नानकशाही/हिंदू पंचांग (पौष माह के शुक्ल पक्ष की सप्तमी तिथि) के अनुसार हर साल इस पर्व की तिथि बदलती है। आइए जानते हैं आगामी प्रकाश पर्व की सही तिथि, इतिहास और इसका धार्मिक महत्व।

गुरु गोबिंद सिंह जयंती जानें इतिहास और खालसा पंथ की स्थापना .सिख धर्म के 10वें और अंतिम मानव गुरु, श्री गुरु गोबिंद सिंह जी का प्रकाश पर्व (जयंती) केवल एक धार्मिक उत्सव नहीं, बल्कि वीरता, त्याग, भक्ति और न्याय का प्रतीक है। गुरु गोबिंद सिंह जी एक ऐसे युगपुरुष थे, जिन्होंने अपना पूरा जीवन, परिवार और सर्वस्व मानव जाति की रक्षा और धर्म की स्थापना में न्योछावर कर दिया।

वे एक महान आध्यात्मिक गुरु, अद्वितीय योद्धा, महान कवि, बहुभाषाविद और समाज सुधारक थे। उन्होंने न केवल सिखों को संगठित किया, बल्कि उन्हें अत्याचार के खिलाफ निर्भीक होकर खड़े होने का साहस भी दिया।

Guru Gobind Singh Jayanti
गुरु गोबिंद सिंह जयंती: तिथि, समय, इतिहास और तारीख.

1. आगामी वर्षों में गुरु गोबिंद सिंह जयंती की तिथियां (Dates & Calendar)

नानकशाही कैलेंडर और पारंपरिक चंद्र-सौर पंचांग (पौष माह के शुक्ल पक्ष की सप्तमी तिथि) के अनुसार हर वर्ष गुरु गोबिंद सिंह जी के प्रकाश पर्व की तिथि में बदलाव आता है:

नानकशाही और चंद्र पंचांग की गणनाओं के आधार पर प्रकाश पर्व की तिथियां इस प्रकार हैं:

वर्ष तिथि (Date) दिन (Day) पंचांग तिथि
2026
5 जनवरी / 20 जनवरी सोमवार / मंगलवार पौष शुक्ल सप्तमी
2027 15 जनवरी 2027 शुक्रवार पौष शुक्ल सप्तमी

(नोट: नानकशाही कैलेंडर के अनुसार फिक्स तिथि 5 जनवरी को मानी जाती है, जबकि देश-विदेश के कई गुरुद्वारों में पारंपरिक पंचांग के अनुसार तिथियां तय की जाती हैं।)

2. जन्म और प्रारंभिक जीवन: तख्त श्री पटना साहिब

गुरु गोबिंद सिंह जी का जन्म 22 दिसंबर 1666 को बिहार के पटना शहर (वर्तमान में तख्त श्री पटना साहिब) में हुआ था।

  • बचपन का नाम: उनके बचपन का नाम ‘गोबिंद राय’ था।

  • माता-पिता: उनके पिता सिख धर्म के 9वें गुरु श्री गुरु तेग बहादुर जी और माता देवी गुजरी (माता गुजरी जी) थीं।

  • बाल्यकाल की लीलाएं: बचपन से ही गोबिंद राय जी में अद्भुत साहस और नेतृत्व क्षमता के लक्षण दिखने लगे थे। वे गंगा किनारे अपने बाल-मित्रों के साथ दो दल बनाकर युद्ध-कौशल का अभ्यास और खेल-खेल में सामरिक रणनीतियां बनाया करते थे।

  • शिक्षा और भाषा ज्ञान: पटना साहिब और बाद में आनंदपुर साहिब में रहकर उन्होंने संस्कृत, फारसी, पंजाबी, ब्रजभाषा और अरबी भाषा पर महारत हासिल की। इसके अलावा उन्होंने घुड़सवारी, तीरंदाजी और शस्त्र कला में निपुणता प्राप्त की।

 

आधिकारिक जानकारी के लिए आप विजिट क्र सकते हैं।  श्री ग्रंथ डॉट ओआरजी (SriGranth.org)SriGranth.org – गुरु ग्रंथ साहिब एवं दसम ग्रंथ दर्शन

खालसा कोष / सिखनेट (SikhNet) :  SikhNet – श्री गुरु गोबिंद सिंह जी की वाणी और विचार

3. मात्र 9 वर्ष की आयु में गुरु पद और पिता का बलिदान

17वीं शताब्दी के उत्तरार्ध में मुग़ल बादशाह औरंगज़ेब के शासनकाल में धार्मिक उत्पीड़न अपने चरम पर था। जब कश्मीरी पंडितों का जबरन धर्म परिवर्तन कराया जा रहा था, तब वे अपनी रक्षा की गुहार लेकर गुरु तेग बहादुर जी के पास आनंदपुर साहिब पहुँचे।

तब 9 वर्ष के बालक गोबिंद राय ने अपने पिता से कहा—“पिताजी, इस समय धर्म की रक्षा के लिए आपसे बड़ा और महान पुरुष कौन हो सकता है? आप ही जाकर अपना बलिदान दीजिए।”

  • गुरु तेग बहादुर जी की शहादत: दिल्ली के चांदनी चौक में गुरु तेग बहादुर जी ने धर्म और विचारों की स्वतंत्रता के लिए अपना शीश कटा दिया।

  • 10वें गुरु के रूप में गद्दी: पिता के बलिदान के बाद 11 नवंबर 1675 को मात्र 9 वर्ष की आयु में गोबिंद राय जी सिख धर्म के 10वें गुरु बने।

4. खालसा पंथ की स्थापना (1699): सिखों को मिली नई पहचान

सिख इतिहास में 13 अप्रैल 1699 (वैशाखी का दिन) एक ऐतिहासिक मोड़ साबित हुआ। आनंदपुर साहिब में गुरु गोबिंद सिंह जी ने एक विशाल सभा का आयोजन किया।

‘पंज प्यारे’ की परीक्षा

गुरु जी ने हाथ में नंगी तलवार लेकर सभा में ललकारा—“मुझे धर्म के लिए एक शीश की आवश्यकता है! क्या कोई ऐसा सिख है जो अपना सिर दे सके?” एक-एक करके पाँच निष्ठावान सिख उठे:

  1. दया राम (भाई दया सिंह जी)

  2. धर्म दास (भाई धर्म सिंह जी)

  3. हिम्मत राय (भाई हिम्मत सिंह जी)

  4. मोहकम चंद (भाई मोहकम सिंह जी)

  5. साहिब चंद (भाई साहिब सिंह जी)

गुरु जी उन्हें तंबू के भीतर ले गए और जब बाहर आए तो उनकी तलवार पर रक्त लगा था। लेकिन गुरु जी ने उन पाँचों को नए वस्त्रों और पगड़ी में जीवित बाहर लाया। वे सिख धर्म के ‘पंज प्यारे’ कहलाए।

अमृत संचार और नाम के पीछे ‘सिंह’ व ‘कौर’

गुरु जी ने लोहे के बाटे में जल और पतासे डालकर, अपनी तलवार (खांडे) से उसे हिलाते हुए ‘अमृत’ तैयार किया। उन्होंने पंज प्यारों को यह अमृत छकाया और फिर स्वयं उनके हाथों से अमृत ग्रहण किया।

  • इसी दिन गुरु जी का नाम ‘गोबिंद राय’ से बदलकर ‘गुरु गोबिंद सिंह’ हो गया।

  • उन्होंने पुरुषों के नाम के आगे ‘सिंह’ (शेर) और महिलाओं के नाम के आगे ‘कौर’ (राजकुमारी) जोड़ना अनिवार्य किया, जिससे समाज में जात-पात और ऊंच-नीच का भेदभाव हमेशा के लिए समाप्त हो गया।

5 ककार (Five Ks) का नियम

गुरु गोबिंद सिंह जी ने प्रत्येक सिख/खालसा के लिए 5 ककारों को धारण करना अनिवार्य किया था:

  1. केश (Kesh): बिना कटे बाल (आध्यात्मिकता का प्रतीक)

  2. कंघा (Kangha): लकड़ी की कंधी (स्वच्छता और अनुशासन का प्रतीक)

  3. कड़ा (Kara): लोहे का कड़ा (सत्य और संयम का प्रतीक)

  4. काछा/कच्छेरा (Kachera): सूती अंतर्वस्त्र (उच्च चरित्र का प्रतीक)

  5. कृपाण (Kirpan): छोटी तलवार (अन्याय के खिलाफ रक्षा का प्रतीक)

6. चार साहिबजादों और माता गुजरी जी का अमर बलिदान

गुरु गोबिंद सिंह जी का त्याग इतिहास में अतुलनीय है। उन्होंने धर्म, देश और मानवता की रक्षा के लिए अपने चारों पुत्रों (चार साहिबजादों) और अपनी माता जी को न्योछावर कर दिया।

चमकौर की गढ़ी (बड़े साहिबजादे)

चमकौर के युद्ध में मात्र 40 सिखों ने मुगलों की 10 लाख की सेना का सामना किया।

  • साहिबजादा अजीत सिंह जी (आयु 18 वर्ष): वीरता से लड़ते हुए युद्धभूमि में शहीद हुए।

  • साहिबजादा जुझार सिंह जी (आयु 14 वर्ष): अपने बड़े भाई के बाद मैदान-ए-जंग में उतरे और शहादत पाई।

सरहिंद की दीवार (छोटे साहिबजादे)

  • साहिबजादा जोरावर सिंह जी (आयु 9 वर्ष) और साहिबजादा फतेह सिंह जी (आयु 7 वर्ष) को सरहिंद के नवाब वजीर खान ने इस्लाम स्वीकार न करने पर जिंदा दीवार में चुनवा दिया।

  • पोतों की शहादत की खबर सुनकर माता गुजरी जी ने भी अपने प्राण त्याग दिए।

इसी महान बलिदान की याद में भारत सरकार हर साल 26 दिसंबर को ‘वीर बाल दिवस’ के रूप में मनाती है

7. गुरु गोबिंद सिंह जयंती का महत्व (Significance)

यह दिन केवल एक उत्सव नहीं है, बल्कि अन्याय और अत्याचार के खिलाफ लड़ने की प्रेरणा देता है। गुरु गोबिंद सिंह जी ने अपना पूरा परिवार (चारों साहिबजादे और माता जी) देश और धर्म की रक्षा में न्योछावर कर दिया। उनकी सीख थी कि “सवा लाख से एक लड़ाऊं, तां गोविंद सिंह नाम कहाऊं।”

8. गुरु ग्रंथ साहिब को गुरु पद की सौंप

गुरु गोबिंद सिंह जी जानते थे कि व्यक्तियों पर आधारित गुरु परंपरा को समाप्त करना आवश्यक है ताकि धर्म में कभी पाखंड न फैले।

  • 1708 (नांदेड़, महाराष्ट्र): अपने जोती-जोत समाने से पूर्व गुरु जी ने घोषणा की कि उनके बाद कोई देहधारी (मानव) गुरु नहीं होगा।

  • उन्होंने सिखों को आदेश दिया “सब सिखन को हुकम है, गुरु मानियो ग्रंथ।”

  • उन्होंने पवित्र ‘श्री गुरु ग्रंथ साहिब जी’ को सिखों का शाश्वत और अंतिम गुरु घोषित किया।

9. गुरु गोबिंद सिंह जी की प्रमुख साहित्यिक रचनाएं

गुरु गोबिंद सिंह जी एक उच्च कोटि के विद्वान और कवि भी थे। उनकी प्रमुख रचनाओं का संग्रह ‘दसम ग्रंथ’ कहलाता है। उनकी प्रमुख कृतियां:

  • जाप साहिब (Jaap Sahib): ईश्वर की सर्वव्यापकता का सुंदर वर्णन।

  • बचित्र नाटक (Bachittar Natak): गुरु जी की आत्मकथा और उनके पूर्व जन्मों की कथा।

  • चंडी दी वार (Chandi Di Var): बुराई पर अच्छाई की जीत की प्रेरणा देने वाली रचना।

  • ज़फ़रनामा (Zafarnama): मुग़ल सम्राट औरंगज़ेब को फारसी भाषा में लिखा गया ‘विजय पत्र’, जिसमें औरंगज़ेब के अनैतिक आचरण और धोखे की आलोचना की गई थी।

10. गुरु गोबिंद सिंह जी के अनमोल विचार (Quotes)

  1. “सवा लाख से एक लड़ाऊं, तां गोविंद सिंह नाम कहाऊं।”

  2. “जब आव की औध निदान बने, अत ही रण में तब जूझ मरों।” (अर्थात, जब जीवन का अंतिम क्षण आए, तो मैं धर्म और सत्य की रक्षा के लिए युद्धभूमि में लड़ते हुए प्राण त्यागूँ।)

  3. “यदि आप केवल अपने भविष्य के बारे में सोचते हैं, तो आप वर्तमान को खो देंगे।”

  4. “ईश्वर ने मनुष्य को इसलिए बनाया है ताकि वह संसार में अच्छे कर्म करे और बुराई को मिटाए।”

  5. “किसी की चुगली और निंदा न करें, और अपने वादे से कभी पीछे न हटें।”

प्रकाश पर्व पर कैसे होती है पूजा और उत्सव?

नगर कीर्तन: उत्सव से कुछ दिन पूर्व शहरों और कस्बों में भव्य नगर कीर्तन निकाले जाते हैं। पंज प्यारे जुलूस की अगुवाई करते हैं और गटका (पारंपरिक सिख युद्ध कला) का प्रदर्शन किया जाता है।

अखंड पाठ साहिब: गुरुद्वारों में श्री गुरु ग्रंथ साहिब जी का निरंतर 48 घंटे तक चलने वाला अखंड पाठ आयोजित होता है।

दीवान और शबद कीर्तन: प्रकाश पर्व के दिन तड़के से ही गुरुद्वारों में ‘आसा दी वार’ और गुरु जी की महिमा में शबद-कीर्तन का गायन होता है।

लंगर सेवा: गुरुद्वारों में बिना किसी भेदभाव के लाखों लोगों को गरम और ताजा लंगर परोसा जाता है।

दीपमाला: शाम के समय गुरुद्वारों (विशेष रूप से स्वर्ण मंदिर, पटना साहिब, आनंदपुर साहिब और नांदेड़ साहिब) को सुंदर लाइटों और दीयों से सजाया जाता है।

निष्कर्ष

श्री गुरु गोबिंद सिंह जी का जीवन मानवता के लिए एक प्रेरणापुंज है। उन्होंने हमें सिखाया कि अत्याचार चाहे कितना भी शक्तिशाली क्यों न हो, सत्य और न्याय के रास्ते पर चलने वाले की अंततः विजय होती है। उनका प्रकाश पर्व हमें अपने धर्म, संस्कृति और नैतिक मूल्यों की रक्षा के लिए सदैव तत्पर रहने का संदेश देता है।

 

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