Atal Bihari Vajpayee Death Anniversary

वाजपेयी जी की पुण्यतिथि: प्रधानमंत्री से कवि तक जानिए पूरा सफर

16 अगस्त अटल बिहारी वाजपेयी की पुण्यतिथि: प्रधानमंत्री से कवि तक, जानिए अटल जी का पूरा सफर

Atal Bihari Vajpayee Death Anniversary: भारतीय राजनीति के इतिहास में कुछ नाम ऐसे हैं जिन्हें केवल एक राजनीतिक दल या एक पद से जोड़कर नहीं देखा जा सकता। अटल बिहारी वाजपेयी भी ऐसा ही एक नाम हैं। वे प्रधानमंत्री रहे, विपक्ष के नेता रहे, विदेश मंत्री रहे, एक प्रभावशाली सांसद रहे और इन सबसे अलग एक संवेदनशील कवि और शानदार वक्ता भी रहे।

16 अगस्त 2018 को उनके निधन के बाद भारतीय राजनीति ने एक ऐसे नेता को खो दिया, जिसकी पहचान केवल उसकी राजनीतिक विचारधारा से नहीं, बल्कि उसके व्यक्तित्व, भाषण शैली और लोकतांत्रिक व्यवहार से भी बनी थी।

हर साल उनकी पुण्यतिथि पर उन्हें याद किया जाता है। लेकिन अटल जी की कहानी केवल उनकी पुण्यतिथि तक सीमित नहीं है। उनकी पूरी journey को देखें तो एक छोटे शहर के शिक्षक परिवार से निकलकर भारत के प्रधानमंत्री बनने तक का सफर अपने आप में बेहद दिलचस्प है।

आखिर कौन थे अटल बिहारी वाजपेयी? राजनीति में उनकी शुरुआत कैसे हुई? 13 दिन की सरकार के बाद वे दोबारा सत्ता में कैसे लौटे? पोखरण से लेकर कारगिल और Golden Quadrilateral तक उनके प्रधानमंत्री कार्यकाल की प्रमुख उपलब्धियां क्या रहीं? और क्यों आज भी उनके भाषण और कविताएं लोगों को याद हैं?

आइए जानते हैं अटल बिहारी वाजपेयी की जिंदगी और राजनीतिक सफर की पूरी कहानी।

ग्वालियर के शिक्षक परिवार में हुआ जन्म

(अटल बिहारी वाजपेयी का जीवन परिचय)

अटल बिहारी वाजपेयी का जन्म 25 दिसंबर 1924 को तत्कालीन ग्वालियर रियासत में हुआ था, जो आज मध्य प्रदेश का हिस्सा है।

उनके पिता कृष्ण बिहारी वाजपेयी एक शिक्षक थे। यानी जिस व्यक्ति ने आगे चलकर देश की राजनीति में अपनी अलग पहचान बनाई, उसकी शुरुआत एक साधारण शिक्षक परिवार से हुई थी।

बचपन से ही अटल जी की रुचि पढ़ाई, साहित्य और सार्वजनिक जीवन में थी। उन्होंने राजनीति विज्ञान और कानून की पढ़ाई की और कॉलेज के दिनों में ही देश और विदेश से जुड़े विषयों में उनकी दिलचस्पी बढ़ने लगी थी।

प्रधानमंत्री कार्यालय की आधिकारिक biography के अनुसार, छात्र जीवन में ही वे राष्ट्रवादी राजनीति से जुड़े और 1942 के भारत छोड़ो आंदोलन में भी उनकी भागीदारी रही। यही वह दौर था जिसने उनके आगे के सार्वजनिक जीवन की दिशा तय करने में बड़ी भूमिका निभाई।

वाजपेयी जी की पुण्यतिथि: प्रधानमंत्री से कवि तक जानिए पूरा सफर राजनीति से पहले पत्रकारिता में रखा कदम

अटल बिहारी वाजपेयी का राजनीतिक सफर: अटल बिहारी वाजपेयी को आमतौर पर लोग एक बड़े राजनीतिक नेता के रूप में जानते हैं, लेकिन उनका एक महत्वपूर्ण परिचय journalist का भी रहा है।

उन्होंने पत्रकारिता के जरिए अपने विचार लोगों तक पहुंचाए। लेखन और भाषण दोनों में उनकी भाषा पर मजबूत पकड़ थी।951 में वे भारतीय जनसंघ से जुड़े और इसके बाद उनका पूरा focus सक्रिय राजनीति की ओर हो गया। भारतीय जनसंघ आगे चलकर भारतीय जनता पार्टी की राजनीतिक यात्रा का महत्वपूर्ण आधार बना।

यहीं से उनकी political journey ने तेजी पकड़नी शुरू की।

1957 में संसद पहुंचे प्रधानमंत्री से कवि तकtal-bihari-vajpayee-death-anniversary-biography

अटल बिहारी वाजपेयी पहली बार 1957 में लोकसभा के लिए चुने गए। संसद में पहुंचते ही उनकी पहचान एक प्रभावशाली वक्ता के रूप में बनने लगी।

उनके भाषणों में एक खास बात थी। वे कठिन राजनीतिक मुद्दों को भी सरल भाषा में समझाने की कोशिश करते थे। उनका बोलने का अंदाज भी बाकी नेताओं से अलग था। वे बहुत तेजी से बोलने के बजाय शब्दों के बीच ठहराव रखते थे, जिससे उनकी बात का असर और बढ़ जाता था। धीरे-धीरे वे विपक्ष की एक प्रमुख आवाज बन गए। उनका संसदीय career चार दशकों से भी ज्यादा लंबा रहा। प्रधानमंत्री कार्यालय के अनुसार वे 9 बार लोकसभा और 2 बार राज्यसभा के सदस्य चुने गए।

विदेश मंत्री के रूप में भी बनाई पहचान

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उनके प्रधानमंत्री कार्यकाल में भी काम आया, जब भारत को परमाणु परीक्षण, पाकिस्तान, अमेरिका और अन्य बड़ी शक्तियों के साथ संबंधों जैसे कई complex मुद्दों से निपटना पड़ा।

 

1977 में जनता पार्टी की सरकार बनने के बाद अटल बिहारी वाजपेयी को विदेश मंत्री बनाया गया। विदेश मंत्री के तौर पर उन्होंने भारत की foreign policy को अंतरराष्ट्रीय मंच पर प्रस्तुत किया। विदेश मामलों में उनकी रुचि पहले से थी और उन्होंने विभिन्न international forums पर भारत का प्रतिनिधित्व भी किया था।

यही अनुभव आगे चलकर उनके प्रधानमंत्री कार्यकाल में भी काम आया, जब भारत को परमाणु परीक्षण, पाकिस्तान, अमेरिका और अन्य बड़ी शक्तियों के साथ संबंधों जैसे कई complex मुद्दों से निपटना पड़ा।

1996: जब अटल जी पहली बार प्रधानमंत्री बने

अटल बिहारी वाजपेयी के political career का सबसे महत्वपूर्ण मोड़ 1996 में आया। 16 मई 1996 को उन्होंने पहली बार भारत के प्रधानमंत्री के रूप में शपथ ली। लेकिन यह सरकार बहुमत साबित नहीं कर सकी।

ऐतिहासिक भाषण की मूल रिकॉर्डिंग के लिए BBC Hindi का आभार। 

नतीजा यह हुआ कि उनकी सरकार सिर्फ 13 दिन चली और उन्हें प्रधानमंत्री पद से इस्तीफा देना पड़ा। प्रधानमंत्री कार्यालय के official records में भी उनके 1996 के इस short tenure का उल्लेख है। यह शायद उनके राजनीतिक जीवन का सबसे बड़ा setback था। लेकिन कहानी यहीं खत्म नहीं हुई। कुछ ही वर्षों में वही नेता एक ऐसी coalition government का नेतृत्व करने वाला था जो अपना पूरा कार्यकाल पूरा करेगी।

1998 में फिर प्रधानमंत्री बने

1998 में अटल बिहारी वाजपेयी दोबारा प्रधानमंत्री बने। इस बार उनके सामने एक अलग चुनौती थी—Coalition Government को संभालना। कई अलग-अलग राजनीतिक दलों को साथ लेकर सरकार चलाना आसान नहीं था। लेकिन वाजपेयी की communication और consensus-building की क्षमता को उनकी बड़ी political strengths में गिना गया।

1999 में एक बार फिर चुनाव हुए और वाजपेयी के नेतृत्व में NDA सरकार बनी। 13 अक्टूबर 1999 को उन्होंने लगातार दूसरी बार प्रधानमंत्री पद संभाला। प्रधानमंत्री कार्यालय के अनुसार, यह नई coalition government National Democratic Alliance (NDA) के नेतृत्व में बनी थी। इस बार सरकार ने अपना पूरा कार्यकाल पूरा किया और मई 2004 तक वे प्रधानमंत्री रहे।

पोखरण-II: जब भारत ने दुनिया को अपनी Nuclear Capability दिखाई

अटल बिहारी वाजपेयी के प्रधानमंत्री कार्यकाल की सबसे बड़ी और सबसे चर्चित घटनाओं में से एक था Pokhran-II। मई 1998 में भारत ने राजस्थान के पोखरण में परमाणु परीक्षण किए। इस फैसले ने पूरी दुनिया का ध्यान भारत की ओर खींचा।

भारत को international pressure और sanctions का सामना करना पड़ा, लेकिन सरकार ने national security और strategic autonomy के दृष्टिकोण से अपने फैसले का बचाव किया। इन परीक्षणों के बाद भारत की nuclear policy अंतरराष्ट्रीय राजनीति में एक बड़ा विषय बन गई।

पोखरण के बाद विज्ञान और technology को लेकर भी सरकार ने जोर बढ़ाया। PIB के एक आधिकारिक विवरण में वाजपेयी द्वारा “Jai Vigyan” को “Jai Jawan, Jai Kisan” के साथ जोड़ने का उल्लेख मिलता है।

पाकिस्तान के लिए शांति का संदेश भी दिया

वाजपेयी की image को केवल एक मजबूत security-oriented leader के रूप में देखना पूरी तस्वीर नहीं बताता। उन्होंने पाकिस्तान के साथ peace और dialogue की कोशिश भी की। 1999 में उन्होंने Delhi-Lahore Bus Service के जरिए पाकिस्तान की ऐतिहासिक यात्रा की। यह कदम भारत-पाकिस्तान संबंधों में शांति की दिशा में एक महत्वपूर्ण symbolic gesture था।

लेकिन कुछ ही समय बाद Kargil War ने दोनों देशों के संबंधों को फिर तनावपूर्ण बना दिया। वाजपेयी सरकार के सामने अब एक बड़ी national security challenge थी।

कारगिल युद्ध के दौरान नेतृत्व death anniversary of atal bihari-vajpayee

1999 का Kargil War भारतीय इतिहास की महत्वपूर्ण सैन्य घटनाओं में शामिल है। भारतीय सेना ने कारगिल की ऊंची पहाड़ियों पर कब्जा करने वाली पाकिस्तानी घुसपैठ को पीछे धकेलने के लिए अभियान चलाया।

वाजपेयी सरकार ने military action के साथ international diplomacy पर भी जोर दिया और दुनिया के सामने भारत का पक्ष रखा। कारगिल युद्ध के दौरान उनके नेतृत्व ने उनकी सरकार की image को और मजबूत किया।

लेकिन युद्ध खत्म होने के बाद भी वाजपेयी ने dialogue का रास्ता पूरी तरह बंद नहीं किया। यही उनकी foreign policy की एक खास बात थी –security के साथ dialogue की कोशिश।

सड़कें और Infrastructure: Golden Quadrilateral की कहानी

अटल बिहारी वाजपेयी के शासनकाल को भारत के infrastructure development के लिए भी याद किया जाता है।

उनकी सरकार के दौरान Golden Quadrilateral Project को तेजी मिली।

इस project का उद्देश्य देश के चार बड़े metropolitan cities—Delhi, Mumbai, Chennai और Kolkata—को high-quality highway network से जोड़ना था।

आज देश में highway connectivity की बात होती है तो Golden Quadrilateral का नाम जरूर सामने आता है।

इसके अलावा Pradhan Mantri Gram Sadak Yojana (PMGSY) के जरिए ग्रामीण क्षेत्रों को बेहतर सड़क संपर्क देने पर भी जोर दिया गया।

PIB के एक आधिकारिक विवरण में Golden Quadrilateral और PMGSY को वाजपेयी सरकार की प्रमुख infrastructure initiatives में शामिल किया गया है।

Telecom Revolution और बदलता भारत

1990 के दशक के आखिर और 2000 के शुरुआती वर्षों में India तेजी से बदल रहा था। Mobile phones धीरे-धीरे आम लोगों तक पहुंचने लगे थे और telecommunications sector में बड़े बदलाव हो रहे थे। वाजपेयी सरकार के दौर में telecom reforms और connectivity को बढ़ावा मिला।

PIB ने उनके कार्यकाल को भारत की connectivity revolution से भी जोड़ा है, जिसमें telecom infrastructure और roads दोनों शामिल थे।

आज जब हम smartphones, internet और high-speed connectivity को रोजमर्रा की जिंदगी का हिस्सा मानते हैं, तब उस दौर की policy changes को भारत के telecom growth के शुरुआती महत्वपूर्ण चरणों में देखा जाता है।

Education पर भी रहा focus

Infrastructure के साथ education भी वाजपेयी सरकार के development agenda का महत्वपूर्ण हिस्सा था। Sarva Shiksha Abhiyan के जरिए elementary education को ज्यादा से ज्यादा बच्चों तक पहुंचाने की कोशिश की गई।

PIB के अनुसार, Sarva Shiksha Abhiyan, PMGSY और Golden Quadrilateral जैसे programmes वाजपेयी सरकार के प्रमुख initiatives में शामिल थे। इसका उद्देश्य केवल economic growth नहीं, बल्कि देश के बड़े हिस्से को basic opportunities से जोड़ना भी था।

अटल जी सिर्फ नेता नहीं, एक कवि भी थे

अटल बिहारी वाजपेयी की सबसे खास बात शायद यह थी कि राजनीति की कठोर दुनिया में रहते हुए भी उनके भीतर एक poet हमेशा मौजूद रहा। वे कविताएं लिखते थे और साहित्य में उनकी पहचान भी थी। उनकी कविताओं में संघर्ष, उम्मीद, देश, निराशा और जीवन जैसे विषय दिखाई देते हैं।

राजनीति में उनके भाषणों का असर भी शायद इसी साहित्यिक background से आता था। वे सिर्फ facts नहीं बोलते थे—उनके शब्दों में emotion और expression भी होता था। प्रधानमंत्री कार्यालय उन्हें एक acclaimed poet और litterateur के रूप में भी दर्ज करता है।

उनकी Speech Style इतनी लोकप्रिय क्यों थी?

अटल बिहारी वाजपेयी की speaking style आज भी भारतीय राजनीति में एक अलग example मानी जाती है। वे अपनी बात रखने में जल्दबाजी नहीं करते थे। एक वाक्य बोलने के बाद रुकना, फिर अगली बात कहना—उनके भाषण का यह अंदाज बहुत प्रभावशाली था।

उनकी भाषा में कभी humour होता था, कभी sarcasm और कभी बेहद गंभीर विचार। सबसे खास बात यह थी कि वे Parliament में अपने political opponents की आलोचना करते हुए भी अपनी भाषा में एक मर्यादा बनाए रखते थे। यही कारण है कि उनके विरोधी भी उनकी oratory skills की तारीफ करते थे।

Coalition Politics में बनाई अलग पहचान

भारत की coalition politics के लिए वाजपेयी का दौर काफी महत्वपूर्ण माना जाता है। एक ऐसी सरकार चलाना जिसमें कई अलग-अलग political parties शामिल हों, अपने आप में चुनौती थी। फिर भी उन्होंने कई दलों को साथ लेकर सरकार चलाई।

2018 में उनके निधन के बाद तत्कालीन उपराष्ट्रपति एम. वेंकैया नायडू ने भी उनके coalition leadership की चर्चा करते हुए कहा था कि उन्होंने 23 दलों की coalition government को सफलतापूर्वक चलाया। यह उनके political communication और consensus-building की क्षमता को समझने का एक महत्वपूर्ण उदाहरण है।

Good Governance की चर्चा

वाजपेयी के शासनकाल के साथ Good Governance की चर्चा भी अक्सर की जाती है। उनके जन्मदिन 25 दिसंबर को बाद में Good Governance Day के रूप में मनाने की परंपरा शुरू हुई।

PIB के अनुसार, उनके governance model में technology, innovation, infrastructure और responsive administration पर जोर देने की बात कही गई है। हालांकि किसी भी सरकार के कामकाज का मूल्यांकन केवल एक slogan से नहीं किया जा सकता। वाजपेयी सरकार की policies और decisions को उनके समय की आर्थिक, राजनीतिक और international परिस्थितियों के संदर्भ में समझना अधिक उचित है।

अटल बिहारी वाजपेयी को मिले बड़े सम्मान

अटल बिहारी वाजपेयी को उनके लंबे public life के लिए कई सम्मान मिले। उन्हें 1992 में Padma Vibhushan से सम्मानित किया गया। 1994 में उन्हें Best Parliamentarian का सम्मान मिला। इसके बाद 2015 में उन्हें देश के सर्वोच्च नागरिक सम्मान Bharat Ratna से सम्मानित किया गया। 27 मार्च 2015 को तत्कालीन राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी ने उनके निवास पर जाकर उन्हें भारत रत्न प्रदान किया। यह एक विशेष ceremony थी। यह सम्मान उनके निधन से पहले उन्हें दिया गया था।

2004 के बाद धीरे-धीरे Public Life से दूर हुए

2004 के लोकसभा चुनाव के बाद अटल बिहारी वाजपेयी प्रधानमंत्री पद से बाहर हो गए। इसके बाद उम्र और स्वास्थ्य से जुड़ी परिस्थितियों के कारण उनकी public appearances धीरे-धीरे कम होती गईं। लेकिन राजनीतिक जीवन से दूरी के बावजूद उनकी popularity कम नहीं हुई। उनके पुराने भाषण, कविताएं और राजनीतिक घटनाओं से जुड़े किस्से लगातार लोगों के बीच चर्चा में रहे।

16 अगस्त 2018 को हुआ निधन

16 अगस्त 2018 को अटल बिहारी वाजपेयी का निधन हुआ। सरकार की आधिकारिक घोषणा के अनुसार उनका निधन नई दिल्ली के AIIMS में हुआ। इसके बाद भारत सरकार ने उनके सम्मान में सात दिन के राजकीय शोक की घोषणा की थी।

उनके निधन के बाद राजनीतिक विचारधाराओं से अलग-अलग लोगों ने उन्हें श्रद्धांजलि दी। यह अपने आप में उनके लंबे public life की एक खास पहचान थी।

क्यों आज भी याद किए जाते हैं अटल बिहारी वाजपेयी?

अटल बिहारी वाजपेयी को याद करने के कई कारण हैं। वे एक Prime Minister थे, लेकिन सिर्फ प्रधानमंत्री के रूप में उनकी पहचान नहीं बनी।वे एक Parliamentarian थे, जिन्होंने चार दशकों से ज्यादा समय तक संसद में अपनी भूमिका निभाई। वे Foreign Minister रहे और भारत की विदेश नीति से जुड़े महत्वपूर्ण दौर का हिस्सा बने। वे Opposition Leader रहे और सत्ता से बाहर रहते हुए भी लोकतांत्रिक राजनीति में सक्रिय रहे।

वे Poet थे, इसलिए उनकी पहचान राजनीति की सीमाओं से बाहर भी बनी। और वे ऐसे Orator थे जिनके भाषण आज भी YouTube और social media पर सुने जाते हैं।

उनके प्रधानमंत्री कार्यकाल में Pokhran-II, Kargil War, Lahore Bus Journey, Golden Quadrilateral, PMGSY, telecom reforms और education initiatives जैसे कई बड़े developments हुए। इनमें से हर मुद्दे पर अलग-अलग दृष्टिकोण और बहस हो सकती है, लेकिन यह नहीं नकारा जा सकता कि उनके समय में भारत ने कई महत्वपूर्ण strategic और economic decisions लिए।

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टल जी की सबसे बड़ी Legacy क्या है?

किसी नेता की legacy केवल उसके द्वारा शुरू की गई schemes या लिए गए फैसलों से तय नहीं होती। वाजपेयी की legacy में उनका political personality भी शामिल है। वे ऐसे समय में coalition government चला रहे थे जब अलग-अलग राजनीतिक दलों को एक साथ रखना आसान नहीं था।उन्होंने national security के मुद्दों पर मजबूत रुख अपनाया, लेकिन दूसरी तरफ Pakistan के साथ dialogue की कोशिश भी की।

उन्होंने nuclear tests का फैसला लिया, लेकिन science और development की बात भी की।उन्होंने highways और connectivity को महत्व दिया, तो education पर भी focus किया। और शायद सबसे अलग बात यह थी कि इतनी intense politics के बीच भी उन्होंने साहित्य और कविता को अपने जीवन से अलग नहीं होने दिया।

पुण्यतिथि पर अटल जी को याद करने का अर्थ

16 अगस्त सिर्फ अटल बिहारी वाजपेयी की death anniversary की तारीख नहीं है। यह उस पूरी journey को याद करने का दिन भी है जिसमें एक शिक्षक के बेटे ने पत्रकारिता से शुरुआत की, Parliament में अपनी जगह बनाई, विपक्ष के नेता बने, विदेश मंत्री बने और अंततः भारत के प्रधानमंत्री पद तक पहुंचे।

उनका political journey उतार-चढ़ाव से भरा रहा। एक तरफ 13 दिन की सरकार थी, तो दूसरी तरफ लगभग छह साल तक चली NDA सरकार। एक तरफ nuclear tests थे, तो दूसरी तरफ Lahore bus यात्रा। एक तरफ Kargil का युद्ध था, तो दूसरी तरफ peace talks की कोशिश। यही विरोधाभास शायद उनके राजनीतिक जीवन को इतना interesting बनाता है।

निष्कर्ष: “सदैव अटल”

अटल बिहारी वाजपेयी को केवल एक पूर्व प्रधानमंत्री के रूप में याद करना उनकी पूरी personality को छोटा कर देना होगा।

वे एक statesman, parliamentarian, poet, journalist और powerful orator थे।

उनकी राजनीति से सहमत या असहमत होना अलग बात है, लेकिन भारतीय लोकतंत्र और public life में उनके लंबे योगदान को समझना जरूरी है। ग्वालियर के एक शिक्षक परिवार से शुरू हुई उनकी यात्रा भारत के प्रधानमंत्री पद तक पहुंची और फिर भारतीय राजनीति के इतिहास का हिस्सा बन गई।

आज उनकी पुण्यतिथि पर उन्हें याद करते हुए उनके राजनीतिक फैसलों, उनकी उपलब्धियों और उनकी कमियों -तीनों को इतिहास के संदर्भ में समझना ही उनके प्रति सच्ची श्रद्धांजलि होगी।

अटल बिहारी वाजपेयी आज हमारे बीच नहीं हैं, लेकिन उनके भाषण, उनकी कविताएं और उनके राजनीतिक जीवन से जुड़ी घटनाएं आने वाली पीढ़ियों को उनके व्यक्तित्व की कहानी सुनाती रहेंगी।

भारत रत्न अटल बिहारी वाजपेयी जी को पुण्यतिथि पर विनम्र श्रद्धांजलि।

सदैव अटल। 🇮🇳

 

 

 

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