दिल्ली कितनी बार बसी और उजड़ी? इंद्रप्रस्थ से New Delhi तक जानिए राजधानी बनने की पूरी कहानी
क्या आपने कभी सोचा है कि आज की Delhi आखिर कितनी पुरानी है?
आज जिस दिल्ली में Metro दौड़ती है, बड़े-बड़े flyovers हैं, Parliament और सरकारी दफ्तर हैं, उसी जमीन पर कभी किले थे, महल थे, बाजार थे और ऐसी राजधानियां थीं जिनके बारे में आज बहुत कम लोग जानते हैं। दिल्ली की कहानी सिर्फ एक शहर की कहानी नहीं है। यह कई शहरों के बनने, उजड़ने और फिर उन्हीं खंडहरों के आसपास एक नई दिल्ली के बसने की कहानी है।
कभी यहां इंद्रप्रस्थ की कहानी सुनाई जाती थी, फिर लाल कोट और किला राय पिथौरा का दौर आया। इसके बाद सिरी, तुगलकाबाद, जहांपनाह, फिरोजाबाद, दीनपनाह और शाहजहानाबाद जैसे शहर अस्तित्व में आए। और फिर अंग्रेजों के दौर में बनी New Delhi, जो आज भारत की राजधानी है। तो सवाल है..
दिल्ली आखिर कितनी बार बसी और उजड़ी?
इसका जवाब देना उतना आसान नहीं है, क्योंकि historians अलग-अलग settlements को “Delhi” के historical cities के रूप में गिनते हैं। आम तौर पर Delhi के Seven Historical Cities की बात की जाती है, लेकिन कुछ इतिहासकार इससे ज्यादा settlements को भी दिल्ली के विकास की कहानी में शामिल करते हैं।
इसलिए दिल्ली की कहानी को एक fixed number से ज्यादा एक लगातार बदलती हुई urban history के रूप में समझना बेहतर है।
आइए इस पूरी कहानी को आसान भाषा में समझते हैं।
दिल्ली कितनी बार बसी और उजड़ी? इंद्रप्रस्थ से New Delhi तक
इंद्रप्रस्थ: क्या यही थी, सबसे पहली दिल्ली?
1. दिल्ली का नाम आते ही सबसे पहले इंद्रप्रस्थ का नाम याद आता है।
महाभारत में इंद्रप्रस्थ को पांडवों की राजधानी के रूप में बताया गया है। माना जाता है कि यह क्षेत्र आज के पुराना किला और उसके आसपास के इलाके से जुड़ा हुआ था। लेकिन यहां एक important बात समझना जरूरी है।

इंद्रप्रस्थ का महाभारत से जुड़ाव साहित्य और परंपरा में मिलता है, लेकिन archaeological evidence के आधार पर इसे सीधे महाभारत काल के उसी इंद्रप्रस्थ के रूप में साबित करना आसान नहीं है।
पुराना किला क्षेत्र में हुई archaeological excavations में अलग-अलग काल की पुरानी बस्तियों के प्रमाण मिले हैं। इसी वजह से यह जगह दिल्ली के सबसे fascinating historical locations में से एक है। यानी कहानी में mystery भी है और history भी।
दिल्ली की सच्चाई समझने के लिए: Archaeological Survey of India (ASI): ASI – Delhi Circle विजिट करें।
दिल्ली के ऐतिहासिक स्मारक – UNESCO: Qutb Minar and its Monuments, Delhi
2. लाल कोट से शुरू हुआ Medieval Delhi का नया दौर
कई सदियों बाद दिल्ली का landscape एक बार फिर बदलता दिखाई देता है। तोमर राजपूत शासकों के समय दिल्ली क्षेत्र में एक महत्वपूर्ण settlement विकसित हुआ, जिसे लाल कोट से जोड़ा जाता है। बाद में चौहान शासक पृथ्वीराज चौहान के समय इसके विस्तार की बात सामने आती है और इसे किला राय पिथौरा के नाम से भी जाना जाता है।
आज अगर आप Mehrauli के आसपास घूमते हैं तो इस पुराने Delhi की कई historical traces दिखाई देती हैं। सोचिए आज जहां Delhi Metro, busy roads और modern buildings हैं, वहीं कभी medieval Delhi की fortified settlement हुआ करती थी।
दिल्ली Sultanate और नई राजधानियों का दौर
12वीं सदी के अंत और 13वीं सदी की शुरुआत में दिल्ली की राजनीति पूरी तरह बदल गई। दिल्ली ultanate का दौर शुरू हुआ और दिल्ली एक महत्वपूर्ण political centre बन गई। यहीं से दिल्ली में एक interesting pattern दिखाई देता है-
एक ruler आया → नई राजधानी या नया fortified settlement बनाया → सत्ता बदली → शहर का महत्व बदला।

इसी वजह से दिल्ली सिर्फ एक बार नहीं बसी। बल्कि अलग-अलग rulers ने अपनी जरूरत के हिसाब से शहर के अलग हिस्सों में नई settlements विकसित कीं।
3. सिरी: अलाउद्दीन खिलजी का शहर
दिल्ली की historical cities में अगला बड़ा नाम आता है सिरी का। अलाउद्दीन खिलजी ने 13वीं-14वीं सदी के आसपास सिरी को विकसित किया। इस शहर का निर्माण केवल रहने के लिए नहीं था। उस समय दिल्ली को बाहरी आक्रमणों से सुरक्षा की जरूरत थी और अलाउद्दीन खिलजी ने अपनी military requirements को ध्यान में रखते हुए एक मजबूत fortified city विकसित की।
आज Siri Fort उसी historical phase की याद दिलाता है। दिल्ली में रहते हुए शायद आपने इसका नाम सुना हो, लेकिन कम लोग जानते हैं कि यह कभी एक बड़े medieval city का हिस्सा था।
4. तुगलकाबाद: एक ऐसा शहर जो पूरा बस भी नहीं पाया
अगर दिल्ली की history में किसी city की कहानी सबसे dramatic लगती है, तो वह है Tughlaqabad। गयासुद्दीन तुगलक ने 14वीं सदी में एक विशाल fortified city बसाने की शुरुआत की। ऊंची दीवारें, massive stone structures और मजबूत fortifications देखकर आज भी अंदाजा लगाया जा सकता है कि यह शहर कितना impressive रहा होगा। लेकिन समस्या यह थी कि तुगलकाबाद लंबे समय तक राजधानी के रूप में कायम नहीं रह सका।
राजनीतिक परिस्थितियां बदलीं और शहर धीरे-धीरे decline की ओर चला गया। आज Tughlaqabad Fort के विशाल खंडहर देखकर एक सवाल मन में आता है-
इतना बड़ा शहर आखिर उजड़ कैसे गया?
यही दिल्ली की history की खासियत है। यहां कई बार ऐसा हुआ कि जिस शहर को बसाने में वर्षों की मेहनत लगी, वह कुछ समय बाद political priorities बदलने के साथ पीछे छूट गया।
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जहांपनाह: कई शहरों को जोड़ने की कोशिश
इसके बाद मोहम्मद बिन तुगलक ने एक और शहर बसाने की कोशिश की – जहाँपना। नाम का अर्थ ही था “दुनिया की शरण।”
इसका उद्देश्य दिल्ली की अलग-अलग पुरानी settlements को एक बड़े fortified urban area में जोड़ना था। आज इसके बहुत कम हिस्से साफ तौर पर दिखाई देते हैं, लेकिन Begumpuri Mosque और आसपास के historical structures उस दौर की याद दिलाते हैं। यहां से हमें एक बात समझ आती है –
Delhi का expansion आज की तरह planned urban development से नहीं, बल्कि कई अलग-अलग political और military decisions से हुआ था।
5. फिरोजाबाद: यमुना के किनारे नई दिल्ली
14वीं सदी में फिरोज शाह तुगलक ने अपनी राजधानी के लिए एक नया शहर विकसित किया। इसे फिरोजाबाद कहा गया। इस शहर का एक हिस्सा आज के Feroz Shah Kotla से जोड़ा जाता है। यमुना के पास location चुनने के पीछे पानी और transportation जैसे practical reasons भी महत्वपूर्ण रहे होंगे।
फिरोज शाह तुगलक को पुराने monuments और structures को संरक्षित करने में भी रुचि थी। आज Feroz Shah Kotla में खड़ा Ashokan Pillar इसका interesting example है। एक pillar जो मूल रूप से मौर्य काल का था, उसे बाद में फिरोज शाह तुगलक दिल्ली लेकर आया।
यानी दिल्ली की history में सिर्फ नए monuments बनाना ही नहीं, बल्कि पुराने इतिहास को अपने शहर में शामिल करना भी दिखाई देता है। यानी दिल्ली की history में सिर्फ नए monuments बनाना ही नहीं, बल्कि पुराने इतिहास को अपने शहर में शामिल करना भी दिखाई देता है।
दीनपनाह और पुराना किला
16वीं सदी में दिल्ली एक बार फिर सत्ता संघर्ष का centre बनी। मुगल सम्राट हुमायूं ने यहां दीनपनाह नामक शहर बसाने की कोशिश की। इसी क्षेत्र को आज Purana Qila से जोड़ा जाता है। लेकिन हुमायूं का शासन ज्यादा स्थिर नहीं रहा।
शेर शाह सूरी ने सत्ता संभाली और इसी क्षेत्र में निर्माण कार्य आगे बढ़ाया। इसलिए आज पुराना किला केवल एक monument नहीं है। यह Mughal और Sur period – दोनों की political history से जुड़ा हुआ है।

शाहजहानाबाद: दिल्ली का सबसे मशहूर पुराना शहर
अब आते हैं उस शहर पर जिसकी पहचान आज भी Old Delhi के रूप में जिंदा है। 17वीं सदी में मुगल बादशाह शाहजहां ने अपनी राजधानी आगरा से दिल्ली की ओर स्थानांतरित की और शाहजहानाबाद बसाया। यही वह शहर है जिसे आज हम largely Old Delhi के रूप में जानते हैं। इस शहर के centre में था –
लाल किला। और इसके आसपास विकसित हुआ चांदनी चौक। इसके अलावा जामा मस्जिद और पुराने बाजारों ने इस शहर की पहचान बनाई।
आज भी Chandni Chowk की गलियों में घूमते हुए आपको ऐसा लगता है जैसे modern Delhi और Mughal-era Delhi एक ही जगह पर खड़ी हैं। यही वजह है कि Old Delhi सिर्फ shopping destination नहीं है। यह एक living history book है।
1857 के बाद बदली दिल्ली की तस्वीर
1857 का विद्रोह दिल्ली के इतिहास में एक major turning point था। दिल्ली उस समय मुगल सम्राट बहादुर शाह जफर से जुड़ी हुई राजनीतिक और सांस्कृतिक पहचान रखती थी। विद्रोह के बाद ब्रिटिश सत्ता ने दिल्ली पर अपना नियंत्रण मजबूत किया। मुगल शासन का अंत हुआ और दिल्ली की political identity बदलने लगी।
आने वाले दशकों में अंग्रेजों ने शहर के infrastructure और administration को अपने हिसाब से reorganise किया। लेकिन अभी दिल्ली को वह रूप मिलना बाकी था जिसे आज हम New Delhi के नाम से जानते हैं।
1911: जब राजधानी Calcutta से Delhi आई
अब कहानी का सबसे बड़ा turning point आता है। 12 दिसंबर 1911 को Delhi Durbar के दौरान ब्रिटिश सरकार ने घोषणा की कि भारत की राजधानी Calcutta से Delhi shift की जाएगी। इसके पीछे कई political और administrative reasons थे।
दिल्ली का historical और geographical importance पहले से था। Mughal Empire की राजधानी के रूप में इसका symbolic importance भी काफी बड़ा था। अब अंग्रेजों ने इसी शहर के आसपास एक नई imperial capital बनाने का फैसला किया। यहीं से शुरू होती है New Delhi की कहानी।
Lutyens और Baker ने बनाई नई राजधानी
नई राजधानी का design तैयार करने की जिम्मेदारी British architects Edwin Lutyens और Herbert Baker जैसे architects से जुड़ी थी। उन्होंने दिल्ली के पुराने शहर से अलग एक planned administrative capital तैयार की। चौड़ी roads, बड़े government buildings, green spaces और carefully planned layout –
यह पुरानी दिल्ली से बिल्कुल अलग urban vision था। इसी नई राजधानी में आगे चलकर Viceroy’s House, Secretariat buildings और दूसरी महत्वपूर्ण structures बनीं। आज Viceroy’s House को हम Rashtrapati Bhavan के नाम से जानते हैं। यानी एक ही शहर में आपको Mughal-era architecture भी मिलेगा और British-era planned architecture भी।
1931: New Delhi का औपचारिक उद्घाटन
नई imperial capital का निर्माण पूरा होने के बाद 1931 में New Delhi का official inauguration हुआ। इसके बाद दिल्ली दो अलग-अलग historical identities के साथ आगे बढ़ने लगी .एक तरफ पुरानी दिल्ली की crowded गलियां, बाजार और Mughal heritage।
दूसरी तरफ New Delhi की wide roads, government buildings और planned neighbourhoods। और यही combination आगे चलकर modern Delhi की पहचान बना।
1947: दिल्ली फिर बनी इतिहास का सेंटर
फिर आया 1947। भारत आजाद हुआ और New Delhi स्वतंत्र भारत की राजधानी बन गई। British Raj की imperial capital अब एक independent democratic nation की capital बन चुकी थी। यहीं से दिल्ली के इतिहास में एक और बड़ा chapter शुरू हुआ। Parliament, government ministries, Supreme Court और दूसरी national institutions के साथ दिल्ली धीरे-धीरे modern India का administrative और political heart बनती गई।
आज की Delhi कैसे बनी?
आज Delhi को देखकर यह कल्पना करना मुश्किल है कि इसके अंदर इतने अलग-अलग historical cities छिपे हुए हैं। लेकिन अगर आप ध्यान से देखें तो दिल्ली की हर layer दिखाई देती है।
- Mehrauli में medieval Delhi की कहानी है।
- Siri में खिलजी काल की यादें हैं।
- Tughlaqabad में तुगलक काल के विशाल ruins हैं।
- Feroz Shah Kotla फिरोज शाह तुगलक के दौर की याद दिलाता है।
- Purana Qila Mughal और Sur period से जुड़ा है।
- Old Delhi शाहजहानाबाद की पहचान संभाले हुए है।
और Lutyens’ Delhi British-era New Delhi की कहानी बताती है। यानी Delhi को सिर्फ एक शहर कहना शायद कम होगा। यह कई centuries की एक layered city है।
तो दिल्ली कितनी बार बसी?
अब वापस उसी सवाल पर आते हैं
दिल्ली कितनी बार बसी और उजड़ी?
आम तौर पर इतिहास की किताबों और tourism literature में दिल्ली की Seven Historical Cities की चर्चा की जाती है:
- Lal Kot / Qila Rai Pithora
- Siri
- Tughlaqabad
- Jahanpanah
- Firozabad
- Dinpanah / Purana Qila
- Shahjahanabad
इसके अलावा इंद्रप्रस्थ की परंपरा और बाद में New Delhi के विकास को भी दिल्ली की व्यापक historical journey में शामिल किया जाता है। इसलिए “दिल्ली सात बार बसी” कहना popular description है, लेकिन वास्तविक history इससे कहीं ज्यादा complex है। दिल्ली में settlements का विकास कई centuries में अलग-अलग stages में हुआ।
दिल्ली की सबसे खास बात क्या है?
शायद यही कि दिल्ली ने अपने पुराने शहरों को पूरी तरह मिटने नहीं दिया। नई Delhi बनी, लेकिन Old Delhi खत्म नहीं हुई। British capital बनी, लेकिन Mughal monuments गायब नहीं हुए। Modern highways और Metro आए, लेकिन Mehrauli और Tughlaqabad आज भी अपनी पुरानी कहानी सुनाते हैं। यही वजह है कि दिल्ली में आप एक ही दिन में कई centuries की यात्रा कर सकते हैं।
सुबह Qutub complex जाइए। फिर Mehrauli की पुरानी गलियों में घूमिए। दोपहर में Old Delhi पहुंचिए। शाम को India Gate जाइए। और अगर इतिहास में थोड़ी और दिलचस्पी है तो Tughlaqabad या Purana Qila की तरफ निकल जाइए। आपको महसूस होगा कि आप सिर्फ Delhi में घूम नहीं रहे हैं-
आप समय की अलग-अलग layers के बीच चल रहे हैं।
दिल्ली सिर्फ राजधानी नहीं, एक living history है
आज New Delhi भारत की political capital है। यहां Parliament है, Rashtrapati Bhavan है, Supreme Court है और देश के बड़े government institutions हैं। लेकिन Delhi की असली खूबसूरती शायद इस बात में है कि modern capital के नीचे कई पुराने शहर आज भी सांस लेते हैं।
कहीं किसी fort की टूटी दीवार है। कहीं पुरानी mosque है। कहीं किसी medieval ruler की बनाई हुई बावली है। कहीं Mughal-era market है। और कहीं British-era boulevard। हर जगह एक अलग कहानी है।
निष्कर्ष
दिल्ली की कहानी किसी एक राजा, एक साम्राज्य या एक शहर की कहानी नहीं है। यह उन तमाम लोगों, शासकों और communities की कहानी है जिन्होंने इस जमीन पर अपने-अपने समय में शहर बसाए। इंद्रप्रस्थ की पौराणिक कथा से लेकर लाल कोट, सिरी और तुगलकाबाद तक, फिरोजाबाद और दीनपनाह से लेकर शाहजहानाबाद तक, और आखिरकार British India की planned capital New Delhi तक..
दिल्ली लगातार बदलती रही। शहर बदले, शासक बदले, सत्ता बदली, लेकिन दिल्ली का महत्व बना रहा। शायद इसलिए दिल्ली के बारे में सबसे सही बात यही कही जा सकती है-दिल्ली सिर्फ एक शहर नहीं है।
यह कई सदियों से लिखी जा रही एक खुली किताब है।
और इस किताब का सबसे interesting हिस्सा यह है कि इसके कई पन्ने आज भी हमारे आसपास मौजूद हैं -बस उन्हें पढ़ने के लिए थोड़ा रुककर देखना पड़ता है।
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